अभी तक किचन में चावल में उबाल आता है लेकिन अब बाजारों में इसकी कीमतों में उबाल आने जा रहा है. सरकारी अनुमानों के अनुसार इस वर्ष 2015-16 में खरीफ फसल का चावल उत्पादन लगभग 9 करोड़ टन ही रहेगा. ïवर्षा की कमी रहने से पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, बिहार, महाराष्टï्र और कर्नाटक में धान की फसल पर बुरा असर पड़ा है. इन राज्यों के मुकाबले मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में हालत कुछ ठीक रही और वह सामान्य स्थिति व उत्पादन से कम ही रहेगी.

अभी तक सभी लोग अन्य सभी खाद्यान्न वस्तुओं के बढ़ते मूल्यों के साथ दाल के भावों में रिकार्ड तोड़ महंगाई से त्रस्त थे. लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस नेतृत्व की यू.पी.ए. सरकार के विरुद्ध खाद्यान्न महंगाई को ही सबसे बड़ा मुद्दा बनाया था. चुनाव प्रचार में इसे उदाहरण के रूप में बोला गया कि जो दालें 12-13 रुपये किलो बिक रही थी वे 25 रुपये किलो तक आ गयीं. अब जब मोदी सरकार सत्ता में आयी तो हकीकत यह हो गयी कि जो दालें 25 रुपये किलो बिकी थीं, वे 200 रुपये किलो तक बिक गयीं. जब अभाव चरमसीमा पर पहुंच गया तब कहीं जाकर दालों का आयात किया गया. उसके आने और वितरित होने में अभी भी काफी देरी और समय लग रहा है. सरकारी काउन्टर खोलने की स्कीम भी हकीकत कम और नाटकबाजी ज्यादा है. कुछ नमूने दिखा दिये और आम लोग कुछ भी नहीं पा रहे हैं. प्याज व खाने के तेल का अभाव भी बढ़ता जा रहा है. वे भी 60-80 रुपये लीटर से 150 रुपये लीटर हो गये.

‘स्वच्छ भारत’ की आड़ में उन सभी जरूरी वस्तुओं पर जिन पर सर्विस टैक्स 14 प्रतिशत चल रहा है उसे 4.50 प्रतिशत और बढ़ाकर बाजार में एक और ऐसी मूल्य वृद्धि कर दी जो घरेलू बजट में टोटल 100 प्रतिशत वृद्धि हो गयी. इसे स्वच्छ भारत उपकर कहा गया है. इससे भारत कितना स्वच्छ होगा यह तो अभी देखना बाकी है लेकिन लोगों की जेबें जरूर साफ हो गयी. समाज में अब ‘जेबकतरोंं’ के साथ-साथ ‘जेब सफाई’ वाले भी आ गये है. इनमें कैसे ‘सावधानÓ रहा जाए. चुनाव पांच साल बाद आता है.

अगर यू.पी.ए. शासन काल में महंगाई बुरे स्तर पर थी तो अब वह बद्तर हो गयी है और बढ़ती ही जा रही है. लोगों से कहा गया था कि ‘अच्छे दिनÓ आने वाले है. ओर महसूस यह हो रहा है कि ‘बुरे दिनÓ आ गये है.

ऐसोसिएटेड चेम्बर ऑफ कामर्स एंड इन्डस्ट्रीज ने सरकार व आमजन को सावधान किया है कि देश में चावल का स्टाक लगातार कम होता जा रहा है. वर्षा अभाव से उत्पादन भी कम हो रहा है. इसलिए चावल के साथ-साथ अन्य सभी खाद्य वस्तुओं दालों, प्याज, खाने का तेल पर सतत् निगरानी रखनी होगी. दालों की तरह अभाव सिर पर आ जाए और मूल्य 200 रुपये किलो तक पहुंच जाए वैसी ही स्थिति तेलों में आ चुकी है. चावल में अब ऐसी अभाव की स्थिति नहीं आनी चाहिए. जितना भी आयात करना पड़े उसे शुरु किया जाना चाहिए. खरीफ में कितना चावल उत्पादन हुआ उसका अंतिम अनुमान लग चुका है. यह 90 मिलियन मीट्रिक टन के आसपास है- जो हमारी जरूरत से काफी कम है. गेहूं और चावल ये दोनों लोगों का मुख्य व मूल भोजन है. इनका न होना भूखमरी होता है. पूरा उत्तर और मध्य भारत तक गेहूं और पूरे दक्षिण, पूरब और उत्तर पूर्वी राज्यों में चावल मुख्य भोजन है.

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