चीन प्रशांत क्षेत्र में तो अपनी जल सीमा को बढ़ाकर अपना प्रभुत्व बढ़ाने का असफल प्रयास कर ही रहा है. वह दूसरे राष्ट्रों के समुद्र क्षेत्र में अपना प्रभाव उसकी कूटनीतिक अर्थनीति से भी कर रहा है. उसकी चाल व जाल में श्रीलंका फंस गया है और पाकिस्तान फंसता जा रहा है. चीन ने उत्तर-पूर्वी अफ्रीका में डिजबोती बंदरगाह को विकसित कर उस राष्ट्र से एक समझौते के तहत उसे अपने संचालन में ले लिया है.

श्रीलंका को चीन ने उसके किसी खास इरादे से आर्थिक विकास के लिए काफी धन उपलब्ध किया, जिससे श्रीलंका का हबंगटोटा समुद्री क्षेत्र भी था. चीन ने यहां बंदरगाह विकसित किया. कालान्तर में जब श्रीलंका उसके द्वारा लिया गया ऋण चीन को नहीं चुका पाया तो चीन ने यह शर्त रख दी कि श्रीलंका ऋण अदायगी न कर पाने के बदले में उसे 99 साल के लिये हबंगटोटा बंदरगाह लीज पर दे दे.

कुछ हीला-हवाला के बाद श्रीलंका को चीन को यह बंदरगाह उसकी 99 साल की लीज की शर्त पर ही देना पड़ा और चीन ने उसका कर्ज लीज देना मान लिया. श्रीलंका में इसका घोर विरोध हो रहा है. सरकार पर यह तक आरोप लग रहा है कि उसने श्रीलंका के इस बंदरगाह को चीन को बेच दिया है- यह ‘सेल आउट’ है.

श्रीलंका में इस करार पर राजनैतिक संकट आया हुआ है. सब यह निश्चित ही मान रहे है कि इन 99 साल में हबंगटोटा श्रीलंका में चीन का उपनिवेश के रूप में उसका पूरी तरह से चीनीकरण हो जायेगा. ही हाल आफ्रीका में डिजबोती बंदरगाह का भी होने वाला है. चीन इस समय अविकसित देशों में विकास के नाम पर भारी मात्रा में धन कर्ज के रुप में धन देकर वहां उसके बदले में चीनी उपनिवेश फैला रहा है.

हबंगटोटा के बारे में यह भी कहा जा रहा है कि उसे चीन ने लीज के नाम पर कर्ज के बदले में उसकी कुर्की कर ली है. पाकिस्तान के बलूच प्रांत में चीन ने ग्वादर समुद्र क्षेत्र में बंदरगाह विकसित किया है. वहीं यहां तक अपना चीन-पाकिस्तान आर्थिक सड़क मार्ग गलियारा भी ले आया है. उसने पाकिस्तान से कहा है कि वह बलूच प्रांत के विकास के लिये ऋण भी दे देना चाहता है. लेकिन श्रीलंका और डिजबोती में चीन की चाल देखकर पाकिस्तान बिचक गया है.

यहां चीन ने विसामेट-बाशा बांध के लिये 14 अरब डालर की आर्थिक मदद की पेशकश की है. लेकिन उसकी शर्त यह थी कि इस बांध पर उसका ही मालिकाना हक रहेगा. पाकिस्तान इस शर्त से घबरा गया और उसने चीन की पेशकश ठुकरा दी और वह खुद ही यह बांध बना रहा है. साथ ही उसने यह स्पष्टï कर दिया कि यहां यह बांध चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा का हिस्सा नहीं माना जायेगा.

चीन इस समय इस प्रयास में लगा है कि इस गलियारे में अफगानिस्तान भी शामिल हो जाए. लेकिन भारत के प्रभाव को वह बड़ी अड़चन मान रहा है. चीन आर्थिक दृष्टि से कमजोर व पिछड़े राष्ट्रों को विकास ऋण की आड़ में उसका नये प्रकार का आर्थिक उपनिवेशवाद फैला रहा है.

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