शिवराज सिंह चौहान और दिग्विजय सिंह की सपत्नीक नर्मदा यात्राएं.

क्रांति चतुर्वेदी
इस साल के अंत में होने वाले मध्यप्रदेश विधानसभा के चुनावी घमासान में प्रदेश की जीवनदायिनी नदी नर्मदा जी केंद्र में रहेंगी. दो दिग्गज नेताओं को नर्मदा यात्रा से नई ऊर्जा मिली तो चुनावी मुद्दों के इर्द-गिर्द भी इसी नदी से तारतम्य रखने वाले मुद्दे- एक दूसरे के तरकश से निकलेंगे.

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज का नर्मदा प्रेम जगजाहिर है. वे इसे बचपन का पालना और बुढ़ापे का आसरा कहते हैं. उन्होंने नर्मदा सेवा यात्रा सम्पन्न की. दुनिया में इसे ‘अनूठा’ करार दिया गया है.

पर्यावरण प्रेमियों ने दिल्ली में उन्हें सम्मानित भी किया. उनकी इस यात्रा से नदी के प्रति राजनैतिक जागृति भी आई. नर्मदा-बेल्ट में उनका लोक सम्पर्क भी खूब हुआ. विपक्ष ने तब भी इसे खूब आड़े हाथ लिया और चुनाव में भी लेगा.

इस नर्मदा यात्रा के खिलाफ साधु-संतों ने नर्मदा घोटाला यात्रा निकालने की धमकी दी. घबराई सरकार ने पांच बाबाओं को राज्य मंत्री का पद देकर चुप कराया. इस कदम की चहुं ओर आलोचना भी हुई. संघ के साथ-साथ भाजपा के भीतर भी इस फैसले पर वरिष्ठï नेताओं की भृकुटि तनी. कांग्रेस इस मुद्दे को हवा में उछालेगी कि वो घोटाले कौन से थे, जिनके उजागर होने के भय से बाबाओं को राज्यमंत्री दर्जे की लॉलीपाप पकड़ाई.

इधर, मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह ने भी सपत्नीक 6 माह की नर्मदा परिक्रमा पूरी की है. वे राजनीति में अगले कदम के लिए नई ऊर्जा से सराबोर हैं. एक तरह से वे नए ‘अवतार’ में हैं. वे शिवराज सिंह चौहान, भाजपा, कांग्रेस में उनके प्रतिद्वंदी और आलाकमान के सामने ‘नए शक्ति केंद्र’ के रूप में उभरे हैं. कांग्रेस को भी राज्य में अपनी रणनीति में बदलाव करना होंगे. उनके पास यात्रा के कुछ अनुभव हैं जिसे वे वक्त-वक्त इस्तेमाल करते रहेंगे.

20 जिले और 114 सीटें

नर्मदा के उद्गम स्थल अमरकंटक से लेकर गुजरात के सीमा क्षेत्र बड़वानी और अलीराजपुर के गांवों तक 20 जिले और 114 विधानसभा सीटें आती हैं. यह सीधे-सीधे नर्मदा बेल्ट में है. इनसे लगे जिलों की सीटें भी नर्मदा से जुड़ाव रखती हैं. चम्बल, ग्वालियर सहित कुछ इलाकों को छोड़ मालवा-निमाड़, महाकौशल और मध्यभारत का हर क्षेत्र नर्मदा से सीधा जुड़ाव रखता है.

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