राजनैतिक दलों का सत्ता व विरोध पक्ष में रहने पर भी चुनावों के अवसर पर वोटरों को प्रभावित करने का तौर तरीका हद से ज्यादा बढ़ गया. ऐसी स्थिति में सुप्रीम कोर्ट ने इसकी भत्र्सना करते हुए भारत के चुनाव आयोग को निर्देशित किया है कि इस पर रोक लगाई जाए.

चुनाव आयोग ने काफी पहले आचार संहिता की प्रक्रिया प्रारंभ कर ठीक चुनावों के समय सरकारों द्वारा प्रलोभन के रूप में वोटरों को प्रभावित करने पर रोक लगाई है. लेकिन अब सत्तारुढ़ पार्टी चुनावों के संदर्भ में आचार संहिता से पूर्व ही वह सब करने लगी जिसमें वोटर प्रभावित हो और दूसरे चुनावी दल अपने चुनाव घोषणा पत्रों मे लुभावने वादे करने लगे कि जीतने की दशा में वे क्या-क्या करेंगे.

लोकसभा चुनावों के संदर्भ में तमिलनाडु में अन्ना द्रमुक सरकार की मुख्यमंत्री जय ललिता लोगों को टेलीविजन बांट रही है. और उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी की अखिलेश यादव सरकार लेपटाप बांट रही है.

मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह हर वर्ग की पृथक महापंचायतें कर वादों का पिटारा खोल दिया. राजनैतिक पार्टियों द्वारा इस भ्रष्टाचार की शुरुआत छूट, रियायत, माफी अनुदान व मुफ्त कर्ज में होती हुई अब उपहारों तक आ पहुंची है. इसकी शुरुआत हरियाणा लोकदल सरकार के मुख्यमंत्री स्वर्गीय चौधरी देवीलाल ने शुरू की थी. वे बाद में केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी रहे. चुनावों की भूमिका में उन्होंने किसानों पर सरकारी व सहकारी बैंक का कर्ज या कभी उसके ब्याज को माफ करने का काम किया. यह रियायत केवल किसानों तक सीमित थी.

इसे उसके बाद सभी राज्य इस होड़ व दौड़ में शामिल हो गये. बिजली, सिंचाई के बिलों में माफी या अनुदान दिया जाने लगा. मध्यप्रदेश में ‘जीरोÓ ब्याज किसानी कर्ज की व्यवस्था की गई. जिस रकम पर ब्याज न हो उसे कर्ज कहा ही नहीं जा सकता है. वह या तो अनुदान या अनुग्रह ही होगा. हर राज्य में चुनावों के समय एक-दो रुपये किलो में गेहूं चावल मिलने लगता है.

अब यह व्याधि रूप में और गंभीर स्थिति हो गई. अब सुख-समृद्धि के आइटम टीवी, लेपटॉप के भी मुफ्त उपहार दिये जाने लगे. यह सब सरकारी खर्चे से ही होता है. इन उपहारों में मिक्सर, ग्राइन्डर व सोने की थाली शामिल हो गई है. ऐसा लगता है कि कुछ दिनों में राजनैतिक दल ऐसे रियायती या मुफ्त वितरण के ‘माल बाजारÓ खोल देंगे. सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को यह सुझाव दिया है कि पार्टियों के चुनाव घोषणा पत्र भी आचार संहिता के दायरे में लाये जाएं.

प्रधानमंत्री श्री पी.वी. नरसिंहाराव और उनके वित्त मंत्री श्री मनमोहन सिंह ने चुनाव घोषणा पत्र में जनता के साथ विश्वासघात किया था. श्री राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस लोकसभा चुनाव लड़ रही थी. उन्होंने जो पार्टी का घोषणा पत्र जारी किया था उसमें पहला वादा यह था कि सत्ता में आने पर वे पहले 100 दिन में सभी जीवनोपयोगी वस्तुओं के दाम कम कर देंगे. उस समय श्री राजीव गांधी कांग्रेस विपक्ष में थे.

चुनाव अभियान चलते हुए उनकी पैरम्बदूर में हत्या हो गई. पार्टी ने उन्हीं के द्वारा जारी किये चुनाव घोषणा पत्र पर चुनाव लड़ा और जीते. श्री नरसिम्हाराव ने सरकार बनाई और श्री मनमोहन सिंह को वित्तमंत्री बनाया. दोनों ने सबसे पहले यह घोषणा की थी कि पहले 100 दिन या इसके बाद भी जरूरी वस्तुओं के भाव घटना संभव नहीं होगा. अब सुप्रीम कोर्ट के सुझाव को आचार संहिता में लाने से पार्टियां ऐसी वादा खिलाफी नहीं कर सकेंगी. चुनावी वायदों में राजनैतिक व कानूनी बाध्यता होनी ही चाहिए.

संस्थापक : स्व. रामगोपाल माहेश्वरी
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