तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में जल प्रलय आया हुआ है. समुद्र किनारे बसा यह महानगर दूसरा समुद्र बना हुआ है. रेल, सड़क, हवाई यातायात सब ठप्प है. विमान तल पानी में डूबने से बंद कर दिया गया. आपदा का कारण भी स्पष्टï है कि यह विपदा हमारी खुद की बुलायी-बनायी गयी है. हर जगह मकानों का निर्माण कर दिया, जल निकासी का कोई प्रावधान नहीं रखा. नालों पर मकान बना कर खत्म कर दिया.

चेन्नई को यह गौरव हासिल है कि उसका 11 किलोमीटर लंबा समुद्री रेत का मैदान विश्व में सबसे बड़ा है. अब आपदा में भी यह रिकार्ड बन गया है कि इतिहास में चेन्नई व उसके पास के 3 अन्य जिले पेरम्बूर, कांचीपुरम और तिरुवल्लूर जिलों में इस बार तीन दिन में लगातार वर्षा हुई और 28 इंच पानी गिरा. इन तीन दिन में से एक दिन 15 इंच पानी गिरा. मौसम विभाग ने खतरे की गंभीर चेतावनी देते हुए कहा है कि खतरा अभी टला नहीं है. अगले 72 घंटों में भी इतनी ही तेज वर्षा होने के आसार है. ऐसी आपदा के समय पुलिस सेना, नौसेना, वायुसेना व राष्टï्रीय आपदा बचाव सेना कार्य में जुटी है. पूरा शहर डूबा हुआ है. लोगों को निकालना भी बहुत ही दूभर और लगभग असंभव है.

ऐसा ही हाल समुद्र किनारे बसी मुंबई महानगर का भी हो चुका है. वहां भी हर जगह निर्माण से यह हालत हो गयी कि मुंबई का पानी समुद्र तक जा नहीं पाता और मुंबई महासागर अपने आप में एक और समुद्र बन गया. लोगों की कारें पानी में तैरने लगीं. पिछले साल दिल्ली में इसी तरह इसी कारण सब जगह शहर में जल भराव हो गया. पानी भी खूब बरसा और यमुना नदी की बाढ़ का पानी भी निचले इलाके में भर गया.

लेकिन वर्षा और बाढ़ की अब तक की सबसे बड़ी त्रासदी काश्मीर घाटी ने सही है. आमतौर पर काश्मीर घाटी में भारी हिमपात से जनजीवन प्रभावित होता है. वहां के निवासी हिमपात के स्वाभाविक रूप से आदी हैं और उसके इंतजाम भी उनके पास रहते हैं. घाटी के लोग पानी की बाढ़ से बिल्कुल अनजान ही थे. लेकिन दो साल पहले वहां वर्षा और झेलम नदी की बाढ़ से वहां के लोग सकते में आ गये उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा था. झेलम किनारे बसी राजधानी श्रीनगर जलमग्न हो गयी. उसका कितना गहरा व घातक प्रभाव रहा इसका अंदाजा इसी से हो जाता है कि काश्मीर उस संकट से आज तक पूरी तरह उबर नहीं पाया है और लोगों के पुनर्वास का काम राहत के रूप में अभी भी जारी है.

चाहे वे मुम्बई-चेन्नई दिल्ली जैसे महानगर हों या अन्य बड़े-छोटे शहर सभी जगह निर्माण कार्यों से जल निकासी बंद हो गयी है और जरा सी वर्षा में जल भराव हो जाता है. भारत का हर बस स्टैण्ड कीचड़ समस्या की से ग्रस्त होता ही है. अब केंद्र व राज्यों में पी.डब्ल्यूडी. की तरह एक ड्रेनेज मंत्रालय व विभागीय ढांचा बनाया जाए जो हर समय सक्रिय रहकर यह सुनिश्चित करे कि हर जगह भवन, सड़क के किनारे नालियां हैं, वे कचरे से भर तो नहीं गयी हैं और नालों पर निर्माण कार्य न हो. सिर्फ बरसात में हो-हल्ला मचाने से समस्या का समाधान नहीं होगा. पृथक ड्रेनेज विभाग बनाया जाए.

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