भारत सरकार को बिना कुछ किये बैठे ठाले उसके खर्च में 140 अरब रुपये बचने से छप्पर फाड़ बचत के रूप में आमदनी हो गयी. यदि वह चाहे तो इस बचत से वह अपना चालू खाते पर वित्तीय घाटे (फिसकल डेफीशिट) काफी कम कर सकती है. इसके साथ ही ऐसा सुखद अवसर (आपरचुनेटी) बनता दिखाई दे रहा है कि किसान और अनाज क्रेश क्रॉप व्यापारियों के बीच सुखद सम्पर्क पुन: स्थापित हो सकता है.

भारत सरकार की न्यूनतम समर्थन मूल्य (मिनीमम सपोर्ट प्राइज) में ‘न्यूनतमÓ नहीं बल्कि ‘समर्थनÓ मुख्य है. वास्तव में कीमतें न्यूनतम न होकर बाजार भावों से ऊंची रखी जाती हैं- वह किसानों के लिए वास्तविक रूप ‘अधिकतमÓ मूल्य होते हैं. इसलिये सरकारी खरीदी केन्द्रों पर हर साल किसान पहले से अपना रजिस्ट्रेशन कराकर हफ्तों खरीद केन्द्रों पर खड़े रहने को तैयार रहते हैं.
सरकार को न्यूनतम समर्थन मूल्य की नीति इसलिये अपनानी पड़ी कि हर साल खाद्यान्न व क्रेश क्रॉप व्यापारी वर्ग फसल आने के समय आपस में गोलबन्दी करके खरीद की कीमतें कम से कम रखते थे और खरीदी के बाद खाद्यान्न के भाव बढ़ाकर भारी मुनाफा कमाते थे- सट्टïा व्यापार करते थे. देश में जब सभी वस्तुओं के मूल्य बढ़ते जा रहे थे तब भी गेहूं व धान लगातार 5 रुपये किलो पर कई दशकों तक बनाये रखे गये. यह किसानों का भारी शोषण था. जब रासायनिक खादों, कीटनाशकों के भाव जरूरत से ज्यादा और कृषि की लागत बढऩे से वह घाटे का धन्धा और उत्पादन कम होने लगा, तब सरकार को कृषि उत्पादन, किसान व ग्रामीण अर्थव्यवस्था को उठाने के लिए स्थाई तौर पर हर साल समर्थन मूल्य बढ़ाते हुए कृषि उत्पादों को सभी तरफ बढ़ती महंगाई के समकक्ष-समतुल्य लाने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की नीति अपनानी पड़ी. इसका निश्चित ही अर्थव्यवस्था को बहुत लाभ हुआ. ग्रामीण क्षेत्रों में खुशहाली और कृषि व्यवसाय में चमक आयी है.

अभी तक केश क्रॉप काटन में हमारा निर्यात काफी रहा. चीन हमारा सबसे बड़ा खरीददार (आयातक) देश था, लेकिन वह अपना घरेलू कपास उत्पादन भी बढ़ाता रहा. राजनैतिक कारणों से उसने पाकिस्तान व अमेरिका से भी कपास खरीदना शुरु कर दिया. इस कारण उसका भारत से कपास का आयात घटता जा रहा था और भारत का निर्यात गिर रहा था. सरकार को कपास किसान को राहत देने के लिये समर्थन मूल्य में कपास की काफी खरीद करनी पड़ रही थी.

इस साल पाकिस्तान में कपास की खेती बहुत ज्यादा बिगड़ गयी और भारत में कपास की उपज बहुत अच्छी आयी है. पाकिस्तान, बंगलादेश, वियतनाम और चीन को भी भारत से कपास की भारी खरीददारी करनी पड़ रही है. भारत में कपास व्यापारियों ने इसे बहुत ही अच्छा मौका समझ कपास की कीमतें सरकार के समर्थन मूल्य 4100 प्रति क्विंटल से भी ज्यादा 4300-4800 रुपये प्रति क्विंटल पर खरीद शुरु कर दी. किसान अब सारा कपास व्यापारियों को बेच रहे हैं. इसकी वजह से सरकार को समर्थन मूल्य पर खरीदने का बोझ अपने आप कम हो गया. उसकी खरीदी 89 प्रतिशत घट गयी और उसकी वजह से उसे 140 अरब रुपयों की भारी बचत हो गयी. इस समय कपास के किसानों को सरकारी ‘समर्थनÓ की जरूरत ही नहीं रही.

व्यापारी वर्ग को इस स्थिति से यह समझ लेना चाहिए कि फसल आने वक्त उनकी भाव गिराने की और खरीद के भाव बढ़ाने की व्यापारिक नीति शोषण व अनैतिक थी. अब खाद्यान्न व्यापारियों को किसान, कृषि व समाज हित में ईमानदारी का धंधा करना चाहिए. यदि उन्होंने ऐसा किया होता तो सरकार को समर्थन मूल्य खरीदी की नीति ही न बनानी पड़ती. इससे किसानों को तो जबरदस्त फायदा हुआ, लेकिन खाद्यान्न व्यापारियों का स्वयं का व्यापार काफी छोटा व सीमित हो गया. उनकी किसान शोषण की नीति आत्मघाती साबित हुई. इस साल कपास के मामले में सरकार की मदद व पहल से व्यापारियों व किसानों को आपस में पुन: परस्पर व्यवहार में सद्भाव स्थापित करना चाहिए.

Related Posts: