राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी ने कहा है कि जजों की नियुक्तियों में पारदर्शिता होनी चाहिए. यह बात सरकार और सुप्रीम कोर्ट दोनों पर ही लागू होती है. देश में जजों की नियुक्तियों पर अभी तक दो तरह की प्रक्रिया चली है. मोदी सरकार एक तीसरी तरह की प्रक्रिया लाना चाहती थी लेकिन उस व्यवस्था का कानून लागू होते ही उसे सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के विपरीत (अल्ट्रा वायरस) करार देकर रद्द कर दिया.

आजादी के बाद केन्द्रीय सरकार स्वयं और राज्य सरकारें कुछ वकीलों व जिला जजों के नाम केन्द्र सरकार के पास भेजते थे और कुछ नाम केन्द्र सरकार स्वयं र्भी विचार के लिये लेती थी, जिन्हें हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में जज नियुक्त करना होता था, लेकिन इसके लिये केन्द्रीय विधि मंत्री और प्रधानमंत्री भारत के मुख्य न्यायाधीश की सहमति लेते. उनके विरोध को मान लिया जाता था. प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने दो-तीन बार श्री मोहन कुमार मंगलम का नाम जज के रूप में नियुक्त किये जाने के लिये बढ़ाया, लेकिन हर बार चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ने उसका विरोध किया और श्री कुमार मंगलम को जज नहीं बनाया जा सका. इसलिये श्रीमती गांधी ने श्री कुमार मंगलम को अपने मंत्रिमंडल में शामिल कर उपकृत किया. श्री कुमार मंगलम मद्रास हाईकोर्ट के ख्याति प्राप्त बेरिस्टर थे और उस राज्य में एडवोकेट जनरल भी रहे. यह प्रकरण यह साबित करता है कि पहले प्रधानमंत्री व चीफ जस्टिस में सद्भाव था- टकराव नहीं
होता था.

लेकिन आगे चलकर 1990 के दशक में जजों की नियुक्तियों के लिये एक नयी प्रथा ‘कालेजीयमÓ प्रारंभ की गयी. इससे भारत के चीफ जस्टिस सुप्रीम कोर्ट के कुछ वरिष्ठ जजों के साथ सलाह-मशविरा से जजों के नाम तय कर प्रधानमंत्री की राय और राष्ट्रपति को भेजने के लिये भेज देते हैं. पहली प्रथा में प्रधानमंत्री चयन करते थे और चीफ जस्टिस से सहमति ली जाती थी और दूसरी प्रथा में चीफ जस्टिस का कालेजीयम तय करता है और प्रधानमंत्री से सहमति ली जाती है.
यू.पी.ए. सरकार में मंत्री श्री कपिल सिब्बल ने पहली बार यह कहकर कालेजीयम सिस्टम पर ऐतराज उठाया कि दुनिया में कहीं भी जज ही जजों की नियुक्ति नहीं करते हैं- जैसे की भारत में की जा रही है. श्री सिब्बल पेशे से एडवोकेट हैं और सुप्रीम कोर्ट में प्रेक्टिस करते हैं. इसके साथ ही सरकार में यह विचार आया कि कालेजीयम की जगह जजों की नियुक्ति में कोई नयी व्यवस्था बनायी व लागू की जाए.

लेकिन इस कार्य को सरकार बदलने के कारण मोदी सरकार ने किया. इसके लिये एक विधेयक लाया गया. जिसमें सरकार, चीफ जस्टिस आफ इंडिया और कुछ नागरिकों को रखने का प्रावधान था. इसके प्रमुख सूत्रधार श्री अरुण जैटली थे. ये भी पेशे से वकील और सुप्रीम कोर्ट में प्रेक्टिस करते है. लेकिन यह कानून संविधान विपरीत करार दिये जाने से रद्द हो गया है और कालेजीयम व्यवस्था चल रही है. लेकिन उसमें अभी कुछ सुधार की प्रक्रिया चल रही है. राष्टï्रपति ने पारदर्शिता की बात कही है.

उसका यह आशय भी हो सकता है कि कालेजीयम भी यह जाहिर करे कि किस व्यक्ति को क्यों और कैसे जज बनाने का फैसला कालेजीयम ने किया है. कालेजीयम व जजों की नियुक्तियों पर मामला अभी बंद नहीं है. विचार व प्रक्रिया जारी है. लेकिन राष्टï्रपति ने यह स्पष्टï कह दिया है कि संविधान में संविधान की व्याख्या का एक मात्र परमाधिकार सुप्रीम कोर्ट का ही है.

Related Posts: