अल्प वर्षा में देश के 10 बड़े भूभाग वाले राज्यों मध्यप्रदेश, महाराष्टï्र, छत्तीसगढ़, ओडीसा, कर्नाटक, आंध्र, तेलंगाना, राजस्थान, झारखंड व उत्तर प्रदेश में जल अभाव व सूखे की स्थिति हो गयी है. गर्मी कुछ देर से आयी, लेकिन एकाएक तेजी से आ गयी. कहीं-कहीं अभी भी वर्षा और ओले भी गिर रहे है. यह इतनी नहीं हो रही कि उससे जल संकट में कोई बड़ा सहारा मिल जाए बल्कि विपरीत स्थिति में खेतों में पकती, कटती फसलें चौपट हो रही है.

आगे तो खाद्यान्न उत्पादन पर इस सूखे का कोई असर पड़ेगा यह तो नहीं कहा जा सकता. मौसम विभाग ने कहा है कि अभी इस साल गर्मी सामान्य से 1-2 डिग्री ज्यादा और तेज पड़ेगी और उसके कारण आने वाले समय में बरसात बहुत अच्छी हो जाने की संभावना है. अभी फसल कटाई के बाद अगली बरसात तक सब्जियों के अलावा फसलों की बोवाई बरसात के बाद ही होगी.

वर्तमान में जो जल अभाव की स्थिति सूखा व अकाल की स्थिति से भी ज्यादा तात्कालिक प्राणलेवा संकट की आ गयी है. अनाज के अभाव में अनाज आयात हो जाता है. व्यक्ति कुछ कम खाकर या भूखा भी रह सकता है लेकिन पानी तो तुरन्त और पूरा होना व मिलना चाहिए. देश में तो दूर से पानी लाया भी जाता है. देवास में स्पेशल टैंकर-ट्रेन से पानी आता है. लेकिन पानी का विदेशों से आयात नहीं किया जा सकता है. ‘जल ही जीवन हैÓ का सिद्धांत उसी समय चरितार्थ होता है जब पानी का अभाव आता है.

भारत ने काफी हद तक उत्पादन बढ़ाकर, आयात कर अनाज की व्यवस्था तो कर रखी है, लेकिन जल व्यवस्था के विकास व प्रबंधन मेें वह अभी बहुत पीछे है जबकि उसे ऐसा नहीं होना चाहिए. भारत इसीलिए कृषि प्रधान देश है क्योंकि यह नदियों का देश है. पूरे देश में प्राकृतिक रचना में बड़ी विशाल अन्तरराज्यीय और मध्यम व छोटी प्रकार की हजारों नदियों का जाल बिछा हुआ है. लेकिन हम धर्म के नाम पर मूर्ति विसर्जन और ठीक इसके विपरीत अपने आत्मघाती कुकर्म से नदियों में मल विसर्जन से आत्मघाती बन चुके हैं. इंदौर की खान और चैन्नई की अडियार नदियां गंदा नाला बन चुकी हैं. हर नाला जो नदी में मिलता है वह पानी भरने की जगह जहर भर रहा है. देश भर में रेवेन्यू रिकार्ड में जो नदियां व तालाब दर्ज हैं वे कभी के अतिक्रमण में नष्टï हो चुके हैं. अतिक्रमण केवल जमीन पर नहीं बल्कि पानी पर भी नदियों, तालाब में काफी पहले का हो चुका है. भारत में सांस्कृतिक रूप से नल पद्धति आने से पहले घरों व शहरों व गांवों में कुआं जीवन का सांस्कृतिक रूप बन चुका था. उसका पनघट साहित्य का श्रृंगार रस का बड़ा आधार है.

भारत वह देश है जिसके तीन तरफ विशाल समुद्री सीमा है. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सदियों बाद यहूदी अपने मूल स्थान पर इसरायल नाम का देश पाकर इतिहास में पहली बार कोई जाति सदियों के अथक संघर्ष व त्रासदी के बाद अपने राष्टï्र को पुन: बना व पा सकी. वहां जमीन के नाम पर रेत और पानी के नाम पर समुद्र का खारा पानी था. उस कौम ने रेत को खेत और डीसेलीनेशन प्रक्रिया से समुद्र के पानी को खारे से मीठा बना कर आज न सिर्फ अरब जगत में बल्कि सारी दुनिया में आर्थिक दृष्टिï से उन्नत व सैनिक दृष्टिï से समर्थ राष्टï्र है. जो 6 अरब मुस्लिम राष्टï्रों का एक साथ हमला झेलकर उन्हें परास्त कर विजयी हुआ था. उसी भावना से वह प्राकृतिक अभावों पर भी विजयी हुआ है.

हमारे इजरायल से बड़े मधुर संबंध हैं. हमें अपनी कई योजनाओं को बंद करके उनका फंड भारत के तीनों और हजारों गांवों, शहरों व महानगरों के लिए समुद्रों का डीसेलीनेशन से पानी मीठा कर देश को पानी में ‘सरप्लस’ बना लेना चाहिए. तीन तरफ का समुद्र प्रकृति का वरदान है. इसराइल ने तकनीक विकसित कर ली है. उससे निकट संबंध हैं. हमें फंड जुटा कर उस तकनीक को भारत के तीनों तरफ फैला देना है.

साथ ही रेवेन्यू रिकार्ड में जो भी नदी, तालाब दर्ज हैं पर गायब कर दिये हैं, उन्हें तुरंत वापस जीवित करना चाहिए. मनरेगा की पूरी शक्ति व फंड इसमें झोंक दिया जाए. साथ ही यह कार्यक्रम दिया जाए कि अगली वर्षा जिसके बहुत अच्छी होने की भविष्यवाणी हो चुकी है, उसके आने से पहले हर गांव का अपना खुद का तालाब हो जाए और आने वाली वर्षा उसके लिए स्थाई वरदान बना जाए इसके लिए हमारे पास सब कुछ है. केवल इच्छा शक्ति व सरकार की गति चाहिए.

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