डॉक्टर अंबेडकर के जीवन काल में और जब वे संविधान सभा की ड्राफ्टिंग कमेटी के चेयरमेन थे उस समय आरक्षण केवल उन 2-3 जातियों जो अछूत समझी जाती थी और आदिवासियों को 10 साल के लिये दिया गया था. शासन से अपेक्षा भी यह की गयी थी. इस अवधि में इनको इतना उन्नत किया जाए कि यह समाज में अन्य जातियों से समकक्ष हो जाए. उस समय देश में यह विचार भी प्रारंभ हुआ कि जाति प्रथा नयी परिस्थितियों और भारतीयता की भावना के अनुकूल नहीं है.

इसलिए इस प्रथा को खत्म करने के भी प्रयास होने चाहिए. लेकिन जाति प्रथा की व्यवस्था ऐसी नहीं थी कि उसे एक कानूून बताकर उस तरह खत्म कर दिया जाए जैसा कि अंग्रेज शासन काल में वायसराय एवं गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बेन्टिग ने सती प्रथा को खत्म किया था.

आरक्षण की 10 साल की अवधि के समय तक डाक्टर अंबेडकर का निधन हो चुका था. ऐसी परिस्थिति में संसद में यह विचार बना कि 10 साल में इन अछूत जातियों व आदिवासियों का इतना विकास नहीं हुआ है कि आरक्षण खत्म किया जाए. इसलिए आरक्षण की अवधि आगे बढ़ा दी गयी. अब यह आरक्षण व्यवस्था स्थाई हो गयी है और जाति व्यवस्था को मिटाने की मूल भावना ही मिट गयी है.

इसके विपरीत जाति प्रथा और मजबूत हो गयी और अब हर जाति आरक्षण मांगने लगी. राजनीतिक विचारधाराओं में वर्ग संघर्ष की एक फिलासफी चलती ही है. लेकिन भारत की परिस्थितियों में आरक्षण की वजह से जाति संघर्ष की स्थिति में आ गयी है. जाट आरक्षण की शुरुआत राजस्थान से हुई है. वहां मीणा जाति को सरकारी नौकरियों के लिये पिछड़ा वर्ग की मान्यता देकर 5 प्रतिशत आरक्षण दे दिया गया. इसी की प्रतिस्पर्धा या जातिगत जलन या द्वेष में जाटों ने भी अपनी जाति के लिये 5 प्रतिशत आरक्षण मांगा. आर्मी के रिटायर कर्नल श्री बेन्सला इस आंदोलन के नेता बनकर उसी तरह उभरे जैसे कभी एकाएक पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों के नेता के रूप में महेंद्र सिंह टिकेत उभर के सामने आये थे.

राजस्थान के जाटों ने महीनों तक देश का मुंबई सेंट्रल और दिल्ली प्रमुख रेलखंड बाधित किया. रेलवे ट्रेक पर टेन्ट लगाकर हजारों जाटों ने धरना दिया. राज्य व केन्द्र सरकार खामोश रही और पूरे देश का रेल यातायात अस्त-व्यस्त हो गया. सरकार की इस कमजोरी सेे देश में यह आन्दोलन की प्रथा बना दी कि यदि कुछ पाना है तो उग्र व हिंसक प्रदर्शन करो. रेलें, सड़कें रोको, सार्वजनिक सम्पत्ति को ध्वस्त कर दो.

इसका परिणाम हरियाणा में यह हो गया कि जाटों ने सरकारी सम्पत्ति के साथ-साथ उससे ज्यादा दूसरी जातियों की निजी सम्पत्ति, घर, दुकानों को जला दिया, लूट डाला. इसकी प्रतिक्रिया भी होनी थी और वह हुई. हरियाणा की 36 जातियों ने मिलकर जाटों का बहिष्कार कर दिया. इन लोगों का आक्रोश भी सही है. आरक्षण की मांग सरकार से संबंधित थी. निजी दुकानों को क्यों लूटा, जलाया गया, दंगों में रोहतक शहर जला डाला.

अब संसद व सरकार को यह कानून बनाकर तय करना होगा कि आन्दोलनों का स्वरूप और सीमा क्या होगी. प्रजातंत्र को भीड़तंत्र नहीं बनने दिया जाना चाहिए. वी.पी. सिंह सरकार द्वारा जारी किया पिछड़ा वर्ग आरक्षण खत्म किया जाए और उन्हीं जातियों तक सीमित रहे जो संविधान के मूल में रखी गई थीं.

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