सुप्रीम कोर्ट ने 17 मार्च 2015 को एक अत्यन्त महत्व व दूरगामी प्रभाव के फैसले में जाट आरक्षण को रद्द कर दिया. जाटों ने यह आरक्षण एक बहुत संगठित व राजनैतिक प्रभाव की जाति होने के कारण दबंगाई आंदोलन से हासिल किया. राजस्थान में इन्होंने महीनों तक दिल्ली कोटा रेलवे पर भारी संख्या में रेल पटरियों पर धरना देकर मुम्बई-सेन्ट्रल-दिल्ली रेल रूट बन्द कर दिया था. रेलवे को अरबों-खरबों रुपयों की और इस मुख्य रेल खंड पर यात्रियों को भारी परेशानी हुई. इन सबसे ऊपर लोगों ने निराशा की भावना से यह महसूस किया कि इस देश में सरकार जैसी कोई चीज नहीं है. किसी भी वर्ग के मु_ïी भर लोग कुछ भी कर सकते हैं और सरकार भी हताश दर्शक बनकर खड़ी रहेगी.

हरियाणा में भी जाटों की खाप पंचायतें ‘ आनर फिलिंगÓ और गांव बाहर व सामाजिक बहिष्कार के फैसले दे रही हैं. अदालतें इन फैैसलों को ही अपराध मान रही है लेकिन यह मतदाताओं का बड़ा वर्ग नियंत्रित करती है इसलिये इन्हें वैधानिक सरकारों द्वारा बहुत ही अवैधानिक तरीके से इनके अपराध व मनमानी नजरअन्दाज किये जाते रहे हैं.
राजस्थान में जबसे मीणा जाति समुदाय को सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिया गया तभी से जाट भी पिछड़ा वर्ग (ओ.बी.सी.) का दर्जा व सरकारी नौकरियों में आरक्षण मांग रहे हैं.

लोकसभा चुनावों के ठीक पहले कांग्रेस नेतृत्व की प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार ने 2 मार्च 2014 को जाटों को केंद्र सरकार की नौकरियों में पिछड़ा वर्ग (ओ.बी.सी.) मानकर आरक्षण दिया था. इससे जाट छात्रों को केन्द्रीय विश्वविद्यालय में भी आरक्षण मिल गया. एक साल बाद ही 17 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने इस आरक्षण के केन्द्र सरकार के नोटीफिकेशन को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि जाट पिछड़ा वर्ग नहीं है. यह राजनैतिक रूप से संगठित है. इसी आधार पर यह आरक्षण दिया गया है- जो बिल्कुल गलत, अनुचित है इसलिए इसे रद्द किया जाता है. यह आरक्षण केन्द्रीय सेवाओं में हरियाणा, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल, उत्तराखंड व पंजाब में लागू हो गया था, लेकिन फिलहाल अन्य किसी और फैसले तक यह आरक्षण इन राज्यों की सेवाओं में लागू बना रहेगा.

जब जाट आरक्षण मांग रहे थे उसी समय यह मामला केन्द्र सरकार के पिछड़ा वर्ग आयोग के समक्ष विचार व निर्णय के लिये गया था और उसने यह व्यवस्था दी थी कि जाट पिछड़ा वर्ग नहीं है इसलिये न तो यह आरक्षण पाने का पात्र है और न ही इसे दिया जाना चाहिए. कोर्ट ने रुलिंग… दी है कि आरक्षण का आधार केवल जाति नहीं हो सकता- वह वर्ग होना चाहिए और उसमें पिछड़ापन होना चाहिए.
केन्द्र सरकार ने इन्हें तथ्यों के विपरीत राजनैतिक रूप से संगठित होने के कारण चुनावों से पहले चुनावों की मद्देनजर यह निर्णय लिया था. कौन पिछड़ा वर्ग है इसकी अनुशंसा पिछड़ा वर्ग आयोग से ही आनी चाहिए. मनमोहन सिंह सरकार ने आयोग के निर्णय के विरुद्ध इन्हें आरक्षण देने का निर्णय किया है.
जाटों की मुख्य दलील यह है कि 85 प्रतिशत जाट आबादी गांवों में रहती है और कृषि करना इनका मूल व्यवसाय है. इनमें शिक्षा की कमी है इसलिये इन्हें पिछड़ा वर्ग ही माना जाना चाहिए.

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