सरकार वस्तु एवं सेवा कर विधेयक (जीएसटी) पारित कराने को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों से विमर्श करने में लगी है. इस विधेयक को पारित कराने के लिए संविधान में संशोधन जरूरी है. यदि सब कुछ ठीक रहा तो इसके लिए अगले माह संसद का विशेष सत्र बुलाया जा सकता है. सरकार की इस सत्र में जीएसटी समेत कई अन्य महत्वपूर्ण विधेयक पारित कराने की मंशा है. विपक्ष के गतिरोध एवं हंगामे के चलते मानसून सत्र अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया था.

मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद संसद के इस चौथे सत्र मेंं भी कई महत्वाकांक्षी विधेयक लटक गए. इसमें देश की अर्थव्यवस्था को गति देने वाला जीएसटी विधेयक पारित होने से रह गया. चूंकि जीएसटी संविधान संशोधन विधेयक है, इसलिए इसके पास कराने के लिए दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन जरूरी है. बहुमत की सरकार होने के बावजूद सरकार इस सत्र को नहीं चला सकी. मात्र 44 सांसदों वाली कांग्रेस ने संसद के दोनों सदनों में गतिरोध बनाए रखा.

लोकसभा और राज्यसभा में 16 दिनों में 176 घंटे काम होना था लेकिन इनमें से 119 घंटे कार्य बाधित रहा. मात्र 57 घंटे ही काम हो पाया. अब इस विधेयक को पारित कराने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाया जा सकता है. चूंकि अभी मानसून सत्र का अवसान नहीं हुआ है इसलिए संसद का विशेष सत्र आहूत किया जा सकता है. यह एक स्वागत योग्य कदम होगा.

संसद में सभी सदस्यों को अपनी बात कहने का अधिकार है. सत्र के दौरान जनहित के तमाम मुद्दों पर चर्चा होती है, इसलिए उसमें किसी प्रकार का व्यवधान सर्वथा अनुचित है. सत्र के दौरान सभी माननीय सदस्यों को अपने क्षेत्र के बारे में कहने का अधिकार है, पर दुर्भाग्य यह है कि इस मानसून सत्र में कांग्रेस के वाकआउट के चलते केवल आठ बार ही प्रश्नकाल हो पाया. माननीय संसद सदस्यों का कत्र्तव्य है कि वे अन्य सदस्यों की बातें सुनें, चर्चा में भाग लें और आम सहमति के आधार पर किसी नतीजे पर पहुंचें. लेकिन दुर्भाग्यवश इस सत्र में ऐसा नहीं हुआ. आरोप-प्रत्यारोप के बीच ही पूरा सत्र बीत गया.

हालांकि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भारी हंगामे के बीच देश में एक समान वस्तु एवं सेवाकर (जीएसटी) विधेयक राज्यसभा में पेश करना चाहा पर कांग्रेस के भारी विरोध के कारण यह संभव नहीं हो सका. 245 सदस्यीय राज्यसभा में कांग्रेस के सर्वाधिक 68 सदस्य हैं जबकि भारतीय जनता पार्टी के 48. ऐसे में इस संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए कम से कम 165 सदस्यों का समर्थन आवश्यक था, जो सरकार नहीं जुटा पाई.

हालांकि राज्यसभा में विपक्ष के नेता आनंद शर्मा का कहना था कि यह विधेयक राज्यसभा में पेश ही नहीं किया जा सकता क्योंकि कार्य मंत्रणा समिति की बैठक में न तो इस पर चर्चा हुई थी और न ही इसके लिए कोई समय आवंटित किया गया था. पूर्व में इस पर चर्चा के लिए आवंटित समय मई में ही लैप्स हो चुका है. उनका यह भी कहना था कि इस विधेयक में टैक्स को एक फीसद बढ़ाकर 18 प्रतिशत से अधिक कर दिया गया है, इसलिए कांग्रेस इसका विरोध कर रही है.

बहरहाल यदि संसदीय मामलों की कैबिनेट कमेटी विशेष सत्र बुलाए जाने का फैसला करती है तो इस जनोपयोगी विधेयक पर विस्तार से चर्चा कर इसे पारित किया जा सकता है. बशर्ते इस बार सभी माननीय सदस्य खुले मन से विधेयक पर चर्चा करें और जनहित को ध्यान में रखते हुए कोई फैसला करें. आम जनता द्वारा चुने गए इन प्रतिनिधियों का दायित्व है कि वे जनता से जुड़े मुद्दों पर भी पार्टी लाइन पर सिरफुटौव्वल करने के बजाए आम राय बनाएं ताकि जनता का भला हो सके.

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