जी.एस.टी. (गुड्स एन्ड सर्विस टैक्स) सुलझता कम है और उलझता ज्यादा जा रहा है. अब तो ऐसा प्रतीत हो रहा है कि यह अपना मूल उद्देश्य- देश में एक-सा टैक्स और एकीकृत बाजार का रूप देने से भी हट रहा है.

जी.एस.टी. के साथ राजनैतिक विचित्र स्थिति भी शुरू से नजर आ रही है. इसमें राष्टï्र से ज्यादा राज्य प्रमुख होते जा रहे हैं. इस टैक्स का उद्देश्य ही यह है कि सभी राज्यों के वित्तमंत्री केंद्रीय वित्तमंत्री की अध्यक्षता में बनी कमेटी पूरे देश के लिये एक ही टैक्स दर निर्धारित करें जिसमें राष्टï्रीय बाजार और राष्टï्रीय व्यापार एक रूप में आ सके.

यह मूल रूप से कांग्रेस नेतृत्व की यू.पी.ए. सरकार का विचार था और उसी शासन काल में केंद्रीय वित्तमंत्री श्री चिदम्बरम ने इसका विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत किया था. उस समय भारतीय जनता पार्टी प्रमुख विपक्ष थी. उसने राज्यों के अधिकार, उनकी वित्तीय स्वायत्ता के प्रश्न इस विधेयक पर इतने अडंगे लगाये कि यह यू.पी.ए. के शासन काल एक्ट नहीं बन पाया. पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का विशेष आग्रह रहा कि देश राजनैतिक एकता के साथ अब इसमें देश में आर्थिक व वित्तीय एकता आ जायेगी. पूरे देश में एक सी टैक्स दरें रहेंगी और पूरा राष्टï्र एक राष्टï्रीय बाजार व्यापार
बन जायेगा.

अब जब भारतीय जनता पार्टी विपक्ष से पक्ष में आकर सरकार बन गयी तो सरकार में बैठने पर उसे भी यह लगा कि इस पर यू.पी.ए. सरकार जो यह चाहती थी कि यह जल्दी से जल्दी एक्ट बन जाए वह सही और राष्टï्र हित में जरूरी था. लेकिन मोदी शासन काल में भी इस विधेयक पर विपक्ष में आ गयी कांग्रेस व अन्य विरोधी दल आपत्ति करतेे है. बड़ी मुश्किल से सहमति बनी और यह विधेयक एक्ट बन सका. लेकिन इसमें कर निर्धारण के लिए राज्यों व केंद्रीय वित्त मंत्री की जो समिति बनी है उसमें राज्यों के वित्त मंत्री करों की दर व उस पर नियंत्रण निर्धारण के लिए राष्टï्रीय नजरिये से नहीं देख रहे हैं. वहां भी हर राज्य के अपने-अपने संकीर्ण हित व अधिकार की बातें प्रमुख हो
जाती हैं.

अभी जीएसटी परिषद की 9वीं बैठक में टैक्स से जुड़े राज्यों व केंद्र के अधिकारों का मसला नहीं सुलझ पाया. इस टैक्स को एक अप्रैल (नये वित्तीय वर्ष) 2017-18 से लागू होना था वह भी आगे एक जुलाई कर दिया गया. इस बैठक विवाद का मुख्य मुद्दा यह रहा कि सालाना डेढ़ करोड़ रुपयों की कमाई करने वाली कंपनियों व संस्थान के टैक्स का आकलन व निर्धारण केंद्र या राज्य कौन करेगा और यह तय हुआ कि इन कंपनियों में उक्त रकम की कमाई का निर्धारण 90 प्रतिशत राज्य और 10 प्रतिशत केंद्र सरकार करेगी.

जबकि होना यह चाहिए कि न सिर्फ जीएसटी बल्कि हर अंतराज्यीय मामलों पर चाहे वह नदी जल विवाद हो, उस पर केंद्र सरकार की भूमिका एक राष्टï्र और राष्टï्रीयता की भूमिका में सुप्रीम कोर्ट की तरह होनी चाहिए कि वह राज्यों के पक्षों को सुनने के बाद उस पर राष्टï्रीय दृष्टिïकोण से राष्टï्रीय हित की दृष्टिï से अंतिम फैसला लेगी और वह राज्यों को उसी तरह मान्य होगा जिस तरह सुप्रीम कोर्ट के फैसले राज्यों के हाईकोर्ट को मान्य करते हैं और उन फैसलों को अन्य सभी वैसे ही मामलों में बाध्यकारी माना
जाता है.

देश के सभी लोगों को जीएसटी लागू होने का बड़ी बेसब्री से इंतजार है. इसमें सभी टैक्स खत्म हो जायेंगे और सिर्फ एक टैक्स जीएसटी लगेगा. इससे पूरे देश में एक भी टैक्स दरें होंगी. हर सेवा-वेट-एक्साइज, सर्विस टैक्स की जगह एक ही टैक्स लगेगा. पूरे देश में वस्तुओं का एक सा मूल्य होगा.

देश में जीएसटी का विचार 2006 में आया था वह पिछले 12 सालों से अभी तक लटक रहा है. राज्यों, पार्टियों व संसद को राष्टï्रहित व जनहित को सर्वोपरि रखना चाहिए.

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