bpl2भोपाल,   राजधानी भोपाल भी अब महानगर बनने की मंजिल के करीब है. महानगरों में सबसे बड़ी समस्या ट्रैफिक जाम की होती है तो जाहिर है कि इस समस्या ने तेजी से फैल रहे इस शहर को भी अपनी चपेट में ले लिया है.
हालांकि यातायात को सुचारू रूप से चलाने के लिए ट्रैफिक सिग्नलों का अहम रोल होता है. लेकिन भोपाल में यही ट्रैफिक सिग्नल जगह-जगह ट्रैफिक जाम की वजह बने हुए हैं.

यहाँ विभिन्न चौराहों पर लगाये गये ट्रैफिक सिग्नल आफत की जड़ इस लिए बने हुए हैं, क्योंकि सिग्नलों में ङ्क्षसक्रोनाइजेशन का बिल्कुल ध्यान नहीं रखा गया है, जो कि सबसे जरूरी बात है. ङ्क्षसक्रोनाइजेशन का मतलब है कि अगर किसी को एक सिग्नल ग्रीन मिलता है तो उसे आगे के सभी सिग्नल भी ग्रीन ही मिलेंगे. यह व्यवस्था मुंबई और अन्य तमाम बड़े शहरों में वर्षों पहले से सफलतापूर्वक चल रही है. उदाहरण के लिए, अगर आपको अरेरा कॉलोनी से एमपी नगर जाना है तो तीन ट्रैफिक सिग्नल पड़ते हैं. पहला भाजपा प्रदेश मुख्यालय, दूसरा प्रगति पेट्रोल पंप एवं तीसरा बोर्ड चौराहा.

अगर भाजपा कार्यालय का सिग्नल हरा मिले तो कोई जरूरी नहीं कि प्रगति पेट्रोल पंप एवं बोर्ड चौराहे के सिग्नल भी हरे ही मिलेे. इससे ट्रैफिक हर जगह रुक जाता है एवं सिग्नल पर भी गाडिय़ों की लम्बी कतारें लग जाती हैं, जिससे ट्रैफिक जाम हो जाता है. यह बदहाली किसी एक जगह की नहीं, बल्कि पूरे शहर की है. अगर ट्रैफिक सिग्नलों का ङ्क्षसक्रोनाइजेशन हो जाये तो भाजपा प्रदेश मुख्यालय से लेकर बोर्ड चौराहे तक हरे सिग्नल ही मिलेंगे, और नतीजतन आगे वाले सिग्नल भी हरे मिलेंगे.

यही स्थिति ज्योति टॉकीज से न्यू मार्केट जाने वालों की भी होती है. सवाल केवल ट्रैफिक जाम का नहीं है. जाहिर सी बात है कि ट्रैफिक जाम के चलते न केवल प्रदूषण बढऩे से पर्यावरण को अपूरणीय क्षति पहँुचती है, बल्कि पेट्रोल और डीज़ल की बरबादी भी होती है. साथ ही, वाहन चालकों और उनके साथ सफर करने वालों का चिड़चिड़ाहट भी मिलती है, जो अन्तत: कई तरह की शारीरिक-मानसिक बीमारियों को भी जन्म देती है. यह तथ्य कई बड़े शहरों में किये गये अध्ययनों से प्रमाणित भी हो चुका है.

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