तमिलनाडु में एक लंबे अर्से तक कांग्रेस के माध्यम से दिग्गज और ख्याति प्राप्त बुद्धिजीवियों का एक छत्र दबदबा रहा. भारत के श्रेष्ठ राजनेता चक्रवर्ती राज गोपालाचारी तमिलनाडु में, जो उस समय मद्रास प्रेसीडेंसी कहा जाता था, सर्वमान्य नेता थे.

आजादी के संघर्ष में वे अग्रणी नेताओं में थे. आजादी के बाद वे भारत के प्रथम भारतीय गवर्नर जनरल थे. अहंकार व दिखावे से इतनी दूर थे कि गवर्नर जनरल रहने के बाद भी मद्रास प्रेसीडेंसी के मुख्यमंत्री बनने से गुरेज नहीं किया. वे दक्षिण भारत में हिन्दी के प्रचार-प्रसार में सबसे आगे रहे. उन्होंने स्वतंत्र पार्टी भी बनायी.

राजाजी के बाद तमिलनाडु में श्री कामराज भी वहां की राजनीति पर छाये रहे. उनके कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद श्री भक्तवत्सलम मुख्यमंत्री बने लेकिन वे द्रविड़ नेताओं की क्षेत्रीयता का मुकाबला नहीं कर पाये. रामास्वामी नेकर द्वारा स्थापित द्रविड़ आंदोलन की पार्टी द्रविड़ मुनैत्र कडघम सत्ता में आ गयी.

कांग्रेस की हालत इतनी गिर गयी कि श्री कामराज भी नगरक्वाइल सीट से विधानसभा चुनाव डी.एम.के. उम्मीदार से हार गये. श्री करुणानिधि डी.एम.के. मुख्यमंत्री बने लेकिन पार्टी में विघटन आया और तमिल फिल्मों के चोटी के अभिनेता श्री एम.जी. रामचन्द्रन ने नयी पार्टी अन्ना द्रमुक बना कर उन्हें मय पार्टी के उखाड़ फेंका. जब तक एम.जी.आर. जिन्दा रहे करुणानिधि कभी आगे नहीं आ पाये- सत्ता उनसे दूर ही रही.

एम.जी. की मृत्यु के बाद से जयाललिता उनकी उत्तराधिकारी के रूप में पार्टी की नेता व मुख्यमंत्री बनीं लेकिन इस दौर में तमिलनाडु में सत्ता अन्ना द्रमुक की जयाललिता और द्रमुक के श्री करुणानिधि के पास आती जाती रही लेकिन वहां सत्ता द्रविड़ पार्टियों के पास ही रही.

कांग्रेस वहां अभी तक वापसी नहीं कर पायी. करुणानिधि ने वहां तमिल क्षेत्रीयता को इतना जमा और फैला दिया कि वहां अब राष्ट्रीय स्तर की राजनीति की संभावना ही नहीं दिख रही है.

श्री करुणानिधि ने अपनी शुरुआत भावनात्मक मुद्दे से शुरू की. उन्होंने एक काल्पनिक मुद्दा बनाया कि हिन्दी तमिल पर छा रही. हिन्दी के विरोध में बहुत ही हिंसक और उग्र आंदोलन चलाकर उन्होंने अपने को स्थापित कर लिया. द्रविड़ राजनीति में फिल्मों का बड़ा जोर रहा, जो कांग्रेस के दौर में नगण्य था.

श्री करुणानिधि उनमें से हैं जिन्हें फिल्मी दुनिया की परिभाषा कैमरे के पीछा का आदमी कहा जाता है. एन.जी. रामचन्द्रन कैमरे के आगे के और सबसे लोकप्रिय अभिनेता थे वे तमिल राजनीति में करुणानिधि से हमेशा आगे रहे. बाद में जयाललिता का दौर एम.जी.आर. के दौर की तरह न हिलाये जाने वाला नहीं रहा.

अब वहां की राजनीति में एक और वर्तमान में चोटी के तमिल अभिनेता श्री रजनीकांत हैं जिन्होंने अब राजनीति में आने की घोषणा कर दी है कि वे नयी पार्टी बना तमिलनाडु के आगामी विधानसभा चुनावों में सभी 234 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे लेकिन यह भी क्षेत्रीय पार्टी है. अच्छी बात यही है कि उनकी पार्टी सभी सीटों पर चुनाव लड़ेगी.

अन्यथा नयी पार्टियां कुछ ही सीटों पर चुनाव लड़कर राजनीति में प्रवेश करती हैं. लेकिन कभी-कभी नयी पार्टियों के सामने ऐसी स्थिति भी आयी है कि जिसे चुनाव में वे सभी सीटों पर ‘धड़ाम’ हो गयी. उनमें बिहार के श्री नीतेश कुमार, उत्तर प्रदेश में अमर सिंह और पाकिस्तान में इमरान खान रहे हैं. लेकिन बाद में नीतेश इमरान जम भी गये हैं.

अभी श्री रजनीकांत ने राजनीति में कदम ही रखा है. जब फिल्मों में ‘हिट’ होता है तो अभिनेता भी ‘हिट’ होकर बुलंदी पर पहुंच जाता है. जैसे श्री रजनीकांत ‘हिट’ होकर फिल्मों में चोटी पर जा बैठे है. लेकिन जब चुनाव की राजनीति में ‘हिट’ होता है तो नेता आसमान से जमीन पर आ धूल चाटता है. फिल्म व राजनीति दोनों मैदान अलग हैं. दोनों के तौर तरीके अलग है.

अभी काफी समय तक श्री रजनीकांत का अति उत्साह के रहना भी स्वाभाविक है. समय के साथ-साथ सामान्य राजनीति में आ जायेंगे. आते ही उन्होंने कह दिया कि सत्ता में अगर वे अपने वादे पूरे नहीं कर पाये तो वे इस्तीफा देकर सत्ता में बाहर आ जायेंगे. पहले वे सत्ता में तो आये फिर देखा जायेगा. वे तो आने से पहले ही ‘इस्तीफा’ देने लगे.

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