देश में खाद्यान्नों का आयात और बम्पर फसलों का आना कृषि की आपदा और सरकारों की मुसीबत बन गया है. केन्द्र सरकार की आयात नीति और समर्थन मूल्यों में तालमेल बैठ नहीं रहा और सभी वर्ग के लोग इससे हैरान-परेशान हो रहे हैं.

इस समय यह स्थिति है कि देश में गेहूं का आयात भी जारी रहा और देश में उसकी बम्पर फसल भी आयी. सरकार के समर्थन मूल्य से गेहूं के दाम इतने ऊंचे हो गए कि देश के खाद्य पदार्थों के उद्योगों को आयातित गेहूं सस्ता पड़ा और उन्होंने वही लिया.

अब सरकार ने गेहूं का आयात शुल्क 10 से बढ़ा दुगना 20 प्रतिशत किया जिससे देश के गेहूं उत्पादन को बाजार मिल सके. मंडियों में व्यापारियों ने गेहूं को समर्थन मूल्य पर नहीं खरीदा.

यही हाल दालों में भी है. ये आयात भी होती रहीं और देश में समर्थन मूल्य से इनके भाव आयातित दालों से ऊपर होने से व्यापारियों ने उसे खरीदा नहीं. सरकार को ही समर्थन मूल्य पर गेहूं और दालें खरीदनी पड़ीं.

अगली फसल के लिए गोदामों को इन्हें बेचकर खाली रखना भी जरूरी हो गया. लेकिन समस्या यह है कि सरकार के गेहूं-दालों को निजी व्यापारी ऊंचे भाव के कारण नहीं खरीद रहे.

देश में खुद की खपत में दालों के उत्पादन में 40 प्रतिशत की कमी रहती है लेकिन नयी फसलों को खरीदने व रखने के लिये सरकार ने दालों का निर्यात खोल दिया, लेकिन वहां भी अब नये सिरे से बाजार ढूंढने व बनाने में समय लग रहा है. साथ ही भावों को भी दूसरे देशों के भावों में प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है.

सरकार के निर्यात खोल देने पर निर्यात नहीं होने लगता है.इनके अलावा आलू में भी यही स्थिति हो गयी है. देश के कोल्ड स्टोरेजों में पिछले साल के आलू का 40 प्रतिशत भाग गोदामों में भरा हुआ है और इस साल भी आलू की बम्पर फसल आ रही है.

पिछले साल की बम्पर फसल के भाव क्रेश हो जाने से किसानों ने इसे प्याज, टमाटर की तरह सड़कों पर फेंका था जबकि आलू साल भर तक कोल्ड स्टोरेज में रखा जा सकता है.

अब यही हाल खाद्य तेलों में हो गया है. देश में खाद्य तेलों का उत्पादन कुल खपत से 60 प्रतिशत कम रहता है जिसे आयात से पूरा करना पड़ता है. साल 2016-17 में देश में खाद्य तेलों का रिकार्ड आयात कर लिया गया.

स्थानीय तेल मिलों के पास अपने क्षेत्र से बाहर भेजने का रास्ता नहीं है इसका परिणाम यह नजर आ रहा है कि तिलहनों की जो फसलें आ रही हैं- उन्हें खरीददार मिलना मुश्किल हो जायेगा. निजी क्षेत्र के व्यापारी उन्हें समर्थन मूल्य नहीं देंगे और उन्हें सरकार को ही खरीदना पड़ेगा.

अजीब स्थिति यह निर्मित हो गयी है कि पिछले साल देश में तिलहन की रिकार्ड पैदावार हुई थी और इस साल भी खरीफ में तिलहनों की अच्छी फसलें आयी हैं. बावजूद इसके खाद्य तेलों का आयात लगातार बढ़ता जा रहा है. पिछले साल 151 लाख टन खाद्य तेलों का आयात किया गया, जो अब तक सबसे ज्यादा सालाना आयात है.

केन्द्र सरकार ने सोयाबीन का समर्थन मूल्य 3050 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है. इसके सबसे बड़े उत्पादक राज्य मध्यप्रदेश व महाराष्ट्र की मंडियों में 2500 रुपये प्रति क्विंटल भाव व्यापारी दे रहे हैं.

सरसों के लिए समर्थन मूल्य 3700 रुपये प्रति क्विंटल है. इसके सबसे बड़े उत्पादक राज्य राजस्थान में उसे 3500 रुपये से भी कम मिल रहा है. भारत की सार्वजनिक वितरण में पाम आइल ही दिया जाता है और इसका 93 लाख टन आयात हो चुका है.

सोयाबीन के बड़े उत्पादक राष्ट्र अमेरिका व ब्राजील में भी बम्पर फसलें आयी हैं. तिलहनों के भाव क्रेश होने की आशंका हो गई है.

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