लोकसभा ने सिर्फसात घंटे में तीन तलाक के विरुद्ध विधेयक को पारित कर शीघ्र सुधार की तरफ भी तेजी से कदम बढ़ा दिया है. बहुत जल्दी ही यह राज्यसभा से भी पारित होकर कानून बन जायेगा.

आल इंडिया मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड की नेत्री श्रीमती शाइस्ता अंबर ने इस विधेयक का स्वागत किया है. अनेक मुस्लिम महिलाओं ने 28 दिसम्बर, जिस दिन यह विधेयक पास हुआ उसे ईद की तरह त्योहार का दिन बताया. आशा की जाती है कि हर साल मुस्लिम महिलाएं 28 दिसम्बर को ”महिला ईद” की तरह मनायेंगी. अभी देश में मुस्लिम महिला ङ्कह्य मुस्लिम मुल्ला जंग चल रही है.

इस जंग में अनेक जागरूक मुसलमान पुरुष महिलाओं का साथ दे रहे हैं. शाहबानो केस में भी कई जागरूक और सुधारवादी मुसलमानों ने उस फैसले को सही माना था लेकिन यह बहुत ही अफसोस की बात हो गयी कि प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी ने मुल्लाओं के दबाव में उस फैसले के विरुद्ध कानून बनाकर महिलाओं को तलाक के बाद भी मुआवजा देने के फैसले को खत्म कर दिया.

तीन तलाक कानून में यह स्पष्ट किया गया है कि यह कानून केवल उन्हीं मामलों में लागू हो गया जिसमें तीन तलाक दिया जायेगा. शेष तलाकों पर यह कानून नहीं है. इसलिये मोदी सरकार को एक और कानून लाना चाहिए कि सभी अन्य तरीके से दिये गये तलाकों के मामलों में भी महिलाओं को मुआवजा पाने का हक होगा अन्यथा अन्य तलाकों में महिला मुआवजा पाने की हकदार नहीं रहेंगी.

एक और अच्छा रास्ता यह भी हो सकता है कि श्री राजीव गांधी ने शाहबानो केस के मुआवजा प्रभाव को खत्म करने के लिये जो कानून संसद में बनवाया था संसद उसे एक खात्मा (रिपील) विधेयक से खत्म कर दे और रिपील विधेयक में यह स्पष्ट कर दिया शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला दिया था वह मूल रूप में प्रभावी माना जायेगा. इससे मुस्लिम महिलायें हर प्रकार के तलाक में मुआवजा पाने की हकदार हो जायेंगी.

अब मुसलमान महिलाओं को कुरीतियों के विरुद्ध अपनी जंग और तेजी से चलानी चाहिए और सुधारवादी मुसलमानों को और सक्रियता से मुस्लिम महिलाओं का साथ देकर मुस्लिम समाज में सभी कुरीतियों को खुद आगे बढ़कर खत्म करना चाहिए.

कई वर्षों पूर्व तक देश में हिन्दुओं में बहुपत्नी प्रथा थी जिसमें कोई संख्या भी निर्धारित नहीं थी. लेकिन उसे कानून बनाकर खत्म कर दिया है. अब हिन्दुओं में बहुपत्नी अवैध व अपराध है. लेकिन उस समय मुसलमानों में धर्म के आधार पर उनकी 4 पत्नियों तक की प्रथा को कायम रहने दिया.

अब मुसलमान महिलाओं और पुरुष वर्ग को भी बहुपत्नी प्रथा कानून से उसी तरह खत्म कराने का अभियान छेडऩा चाहिये जैसे हिन्दुओं में बहुपत्नी प्रथा समाप्त कर दी है.

मुसलमानों में धर्म के नाम पर पर्दा प्रथा (बुर्का पहनना) भी कायम है. हालांकि आज की तेज गति की दुनिया में कई मुसलमान महिलायें बुर्का नहीं पहनतीं. हिन्दुओं में भी परम्परा व रुढि़ में महिलाओं में ‘घूंघट’ प्रथा थी. यह भी अपने आप समाप्त हो गयी है क्योंकि इसके लिये कोई धार्मिक विधान नहीं था लेकिन मुसलमानों में पर्दे पर मजहबी बाध्यता है. इसे भी कानून बनाकर खत्म करना होगा.

इस समय समाज में एक अरसे से कुरीतियों के विरुद्ध कदम उठाये गये हैं. अब दहेज मांगना दंडनीय अपराध हो गया है. हर समाज में तेजी से सुधार हो रहे हैं लेकिन मुसलमान समाज में मजहब के नाम पर तमाम कुरीतियां अभी भी चल रही हैं.

मुसलमान समाज को यह देखना होगा कि आज के समय के अनुसार मुस्लिम महिलाओं के विरुद्ध वे सभी कुरीतियां समाप्त की जाएं जो उन्हें बराबरी का अधिकार नहीं देतीं और उन्हें पुरुषों के मुकाबले कमतर माना जाता है.

लोकसभा ने जिस फुर्ती से महज 7 घंटों में तीन तलाक को अपराध बनाने का विधेयक पारित कर दिया अब वह उसी फुर्ती से वर्षों से लंबित पड़े महिला आरक्षण विधेयक को भी पारित कर दे.

 

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