मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश से दो चिंताजनक खबरें हैं. एमपी में रायसेन के उदयपुरा में बिटिया प्रीति रघुवंशी की आत्महत्या पर न्याय की गुहार और उत्तरप्रदेश के उन्नाव में एक लडक़ी के साथ विधायक पर रेप का आरोप तथा आवाज उठाने पर पुलिस कस्टडी में उसके पिता की हत्या- यहां भी पीडि़त पक्ष द्वारा न्याय की गुहार।

लेकिन लोकतंत्र में सबसे अफसोसजनक समानता दिखाई दे रही है, दोनों पीडि़त के आरोपी दो दबंग हैं.मध्यप्रदेश में लोक निर्माण मंत्री रामपालसिंह और उत्तर प्रदेश में उन्नाव के विधायक कुलदीप सेंगर.जनमानस में सरकारों के लिए यही सवाल उठ रहा है- दबंगों के सामने सिस्टम रेंग क्यों रहा है?

दोनों राज्य मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश में ‘बेटी बचाओ’- सरकारों का प्रमुख नारा है लेकिन दबंगों के आगे यह नारा भी जमीन पर रेंगता नजर आ रहा है. रायसेन में प्रीति ने इसलिए आत्महत्या कर ली क्योंकि रामपाल का बेटा गिरीजेश उससे शादी करने के बाद भी उसे पत्नी का दर्जा देने के बजाए अपनी सगाई की रस्म में शिरकत करने गया था. न्याय की आस में बिटिया प्रीति ने अंतत: आत्महत्या कर ली. लगभग एक माह बाद भी मंत्री रामपाल जस के तस सरकार में मंत्री बने हुए हैं और उनका बेटा सरेआम घूम रहा है.

प्रीति का परिवार चीख-चीखकर न्याय मांग रहा है और कांग्रेस के दिग्गज नेता न्याय यात्राएं निकाल चुके हैं लेकिन सिस्टम के कानों तक जूं नहीं रेंग रही है. उल्टे पुलिस उसके भाई को गायब करवा कर उसे ‘बहकाने’ के प्रयास में लगी है.

रामपाल और उनकी परिवार की पूरी नोटंकी देख ली गई है- पहले प्रीति को बहू मानने से ही इंकार करना और फिर गिरीजेश का पति के रूप में अस्थि विसर्जन में जाना. तमाम दबावों और पीडि़त पक्ष के साथ पुलिस कार्रवाई का ‘अभिनय’ करने के बावजूद प्रीति को न्याय नहीं मिल पा रहा है.

इसी तरह किसी लडक़ी के साथ रेप हो जाए, बहुत मुश्किल से और मीडिया के सवाल उठाने के बाद विधायक पर एफआईआर दर्ज की जाए लेकिन उन पर कार्रवाई न की जाए, यह लोकतंत्र में काम करने की कौन सी सरकारी शैली है? ऊपर से प्रेस कांफ्रेंस में इस आरोपी को डीजीपी और चीफ सेक्रेटरी ‘विधायकजी’ कहकर संबोधित कर रहे हैं. यह दबंगों के सामने मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश सरकारों का नतमस्तक होना ही है. ये लोकतंत्र में खतरनाक संकेत हैं.

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