केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने बताया है कि चना- जो अनाज व दलहन दोनों में उपयोग के अनुसार माना जाता है उसकी तो चालू रबी की फसलों में और सभी दालों की फसलों की रिकार्ड बुआयी की गयी है.

मार्च-अप्रैल में आने वाली रबी फसलों मेंं सबसे प्रमुख गेहूं के साथ-साथ अब चना और दलहन फसलों की तरफ भी पूरे भारत की खेती का रुख हो गया है.

काफी अर्सा पहले देश में गेहूं-चना व दालों की खूब पैदावार होती थी. लेकिन खाद्यान्न तेलों में अभाव की स्थिति बढ़ती ही जा रही है. तिलहनी फसलों से देश की जरूरत का खाद्य तेल का उत्पादन नहीं हो रहा था. देश में खाद्य तेलों का अभाव बढ़ता हुआ 60 प्रतिशत तक हो गया और इसे भारी विदेशी मुद्रा से आयात अभी तक करना पड़ रहा है.

इस अभाव से निपटने के लिये भारत सरकार ने देश की खेती में एक नयी फसल सोयाबीन को लाया. यह भारत की खेती में कभी नहीं रही और न ही किसान इसके बारे में कुछ जानते थे.

केंद्र व राज्य सरकारों के कृषि विभागों ने इसे भारतीय खेती में चलन में लाये. इससे न सिर्फ खाने का तेल मिला बल्कि इसके आटे से अन्य खाद्य वस्तुएं भी बनने लगी. इसके तेल के लिये देश भर में कई आइल मिलें लग गयी और अन्य खाद्य वस्तुओं के बनाने के उद्योग भी स्थापित हो गये.

इसकी मांग बढऩे से भारत के किसान सोयाबीन की तरफ इतने बढ़ गये कि दालों की फसल लेना ही बन्द कर दिया और देश में दालों का 40 प्रतिशत अभाव हो गया और इनका भी खाद्य तेलों की तरह आयात करना पड़ा.

भारतीय भोजन में रोटी-चावल व दाल भोजन की अनिवार्य वस्तुएं थीं. दालें खाने में कम होती गयीं जो प्रोटीन का सबसे बड़ा स्रोत होती हैं- इसके कारण भारत में कुपोषण तेजी से आ गया. खाने में प्रोटीन की कमी हो गई.

पिछले कुछ वर्षों में कुछ व्यापारिक घरानों ने देश में कृत्रिम रूप से दालों का इतना अभाव कर दिया कि दालें रिकार्ड महंगाई में 200 रुपये किलो तक बिक गयी. इससे सरकार भी चिंतित हुई और ऊंचे भावों को देखकर किसान दलहनी फसलों की तरफ वापस लौटे हैं.

इन दिनों पूरी आवश्यकता के लिये दालों का आयात भी होता रहा. इससे देश की दालों और आयात की जा रही दालों में सही मायने में भारी भावन्तर आ गया. विदेश की दालें सस्ती पड़ रही थीं और देश की दालें सरकार के समर्थन मूल्य के कारण महंगी थी. इसे देश के व्यापारियों ने खरीदा नहीं और सरकार को ही उन्हें समर्थन मूल्य पर खरीदना पड़ा.

अब देश में चना व दालों के भाव गिरने लगे हैं. चना 6000 रुपये क्विंटल से गिरकर 4200 रुपये हो गया. इस साल चने की बुआई 8 प्रतिशत ज्यादा क्षेत्र में हुई है और इसकी खेती 78,260 लाख हेक्टेयर में रिकार्ड पर पहुंचेगी. इस साल चने की रिकार्ड पैदावर होगी.

अन्य दालों की फसलें भी 118 लाख हेक्टेयर में हुईं. इस साल देश में चना व दालों का बम्पर उत्पादन होने जा रहा है या तो इनका निर्यात खोलना पड़ेगा और आयात रोकना पड़ेगा अन्यथा दालों के भाव में जो अंतर आता है उससे पूरा व्यापार ही डगमगाता है.

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