भारत में दलित उत्पीडऩ युगों से चली आ रही जाति व्यवस्था का अत्याधिक अमानवीय स्वरूप है. भारत में आजादी की लड़ाई के साथ-साथ इसके विरुद्ध
चेतना आयी.

प्रारंभ में कई उच्च जाति के महापुरुष इसके विरुद्ध सामाजिक चेतना लाते हुए समाज सुधारक व उद्धारक के रूप में सामने आये. जिनमें ज्योतिबा फुले, महात्मा गांधी के नाम प्रमुख रूप से आते है. लेकिन इस अन्याय अत्याचार के विरुद्ध इस समाज को जागृत और अधिकारपूर्वक प्रतिकार व संघर्ष करने के लिये बाबा साहब अंबेडकर ने जो दलित स्वाभिमान व मानव सम्मान का जो राजनैतिक चेतना का अभियान छेड़ा उसी में जातिवाद के इस कलंक पर सक्रिय प्रहार हुआ. वही चेतना आजादी के बाद के भारत के संविधान व कानूनों में मुखर हुई. सतत् रूप से चली आ रही जाति व्यवस्था इस तरह जड़ें जमा चुकी है कि उसे तोडऩे व बदलने में एक अर्सा तो लगेगा.

डाक्टर अंबेडकर की जयंती हर साल इस बारे में चेतना को और आगे बढ़ाती जा रही है. इस बार की डाक्टर अम्बेडकर की 125वीं जयंती इस दिशा में विशेष रूप से उल्लेखनीय है. राष्टï्रव्यापी स्तर पर उसे बड़े भव्य रूप में मनाया गया. प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी उनकी जन्मस्थली महू में उनके उस आवास में भी गये. इस रोज केंद्र के सामाजिक न्याय मंत्रालय ने इस दिशा में दलितों और अदिवासियों के खिलाफ अत्याचार रोकने के लिये अनुसूचित जाति व जनजातियों के कानून में व्यापक बदलाव किया और 14 अप्रैल की अम्बेडकर जयंती के रोज ही उसकी अधिसूचना जारी की गयी.

भारत में जो अदालती प्रक्रिया चल रही है- उसमें कोई गति ही नहीं है. वर्षों, दशकों तक घिसटने वाली ऐसी प्रणाली है जिसे सिर्फ न्याय व्यवस्था कहा जा सकता है- वहां न्याय मिलता ही नहीं है क्योंकि यह माना गया है कि देरी से मिला न्याय न पाना होता है.

कानूनों में तो इन जातियों का उत्पीडऩ खत्म हो चुका है, लेकिन सामाजिक चेतना में इसके प्रति अभी मानवीय व सम्मानजनक व्यवहार का बड़ा अभाव है. सामाजिक रूप से दलितों व आदिवासियों ने काफी जहां उन्नति व विकास किया है, उच्च स्थानों को प्राप्त किया है, वहीं अक्सर दलित उत्पीडऩ पुराने विचारों व व्यवस्था के तहत होता रहता है. भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी ने यह कहा था कि वे समझ नहीं पा रहे कि आज भी दलितों के दूल्हे की घोड़े पर बरात निकालने का कुछ वर्ग क्यों विरोध कर रहे हैं. इससे उन्हें क्या मिल रहा है. ऐसे अवसरों पर यह भी हो रहा कि दलित इसका पूरी ताकत से प्रतिकार करते हैं और शासन व पुलिस संरक्षण में घोड़े पर ही दलित दूल्हे की बरात को निकलवाते है.

राजस्थान में आज भी ऐसा गांव हैं जहां दलित कुएं से पानी नहीं भर सकते. तमाम कानूनों व संवैधानिक अधिकारों के बाद भी दलित उत्पीडऩ हो जाता है. इस मामले में राजनैतिक चेतना तो हो चुकी है, लेकिन सामाजिक स्तर पर कुंठित कर दी परम्पराओं का अमानवीय रूप सामने आ जाता है. उनके निराकरण के इस कानून में व्यापक परिवर्तन किये गये ताकि इन मामलों में तुरन्त कार्यवाही हो. यह महसूस हो कि देर नहीं हुई और दलितों को न्याय मिल गया.

इस मामले में सबसे ज्यादा और पूरा जोर इस मामले पर होना चाहिए कि न्याय निर्धारित अवधि में पूरी तौर पर मिल जाए. आज भी कई कानूनों में ऐसी व्यवस्था है कि उनका निराकरण 6 महीने के भीतर हो जाना चाहिए. वहां भी देरी का ही दौर चल रहा है.

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