सुप्रीम कोर्ट का इरादा तो दहेज कानून की तरह एस.सी./एस.टी. कानून का दुरुपयोग रोकना था. लेकिन 2018 और 2019 चार विधानसभाओं और लोकसभा चुनाव का साल है इसलिये यह अब राजनैतिक मुद्दा बन गया और सभी राजनैतिक दल इस चुनावी परिदृश्य में दलितों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बनाने की स्पर्धा में कूद पड़े हैं.

सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी का अदालत की राय से प्रत्यक्ष रूप से कुछ लेना देना नहीं है. फिर भी राजनैतिक गहमा-गहमी हो जाने से उसने फौरन उस फैसले पर पुनर्विचार याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल कर दी. लेकिन यह मामला दलित संगठनों से भारत बंद आवव्हान व उसमें हो गयी भारी हिंसा अब यह मामला अदालती से राजनैतिक चुनाव बन गया.

कांग्रेस अध्यक्ष श्री राहुल गांधी राजघाट पर दलित उत्पीडऩ पर विरोध जताने उपवास पर बैठ गये और उसके साथ ही देश भर में कांग्रेस के लोग उपवास पर बैठ गये. मायावती का नेतृत्व व उनकी बहुजन समाजपार्टी गत लोकसभा चुनावों में उत्तरप्रदेश में ’जीरो’ हो गयी और विधानसभा में उनकी संख्या काफी कम हो गयी. वे इस समय इस दलित मुद्दे को अपने लिये बहुत बड़ा अवसर मान कर तेजी से आगे आ गयी है.

मध्यप्रदेश के भिंड-मुरैना-ग्वालियर में दलित भारत बंद में भारी हिंसा हो गयी. मध्यप्रदेश पुलिस को यह जानकारी हुई है कि वहां फंड देकर दलित हिंसा भडक़ायी गयी थी. यहां काफी गिरफ्तारी भी हुई है और इन गिरफ्तारियों को भी दलित उत्पीडऩ बताया जा रहा है. इस आंदोलन से मध्यप्रदेश की भाजपायी शिवराज सरकार भी परेशानी महसूस कर रही है.

सुप्रीम कोर्ट का तथ्यपूर्ण निर्णय चुनावी राजनीति की लपटों में आ गया. नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो 2016 की रिपोर्ट के अनुसार देश भर में एससी/एसटी के तहत 47,369 शिकायतें दर्ज हुई थीं. इनमें से 6259 शिकायतें झूठी पायी गयीं. 2270 मामलों में सबूत नहीं मिले, 1020 मामलों में तथ्यों में गड़बड़ी पायी गयी. ऐसे माहौल में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में जो भी नयी प्रक्रिया तय की है वह बहुत ही समुचित व उचित है. इन एक्ट का दुरुपयोग रोकना ही पड़ेगा.

अक्सर यह देखने में आ रहा है कि जब भी किसी दलित या महिला कर्मचारी अधिकारी के खिलाफ कोई कार्यवाही होती है तो वही बचाव व दलील देता है कि क्योंकि वह दलित या महिला है इसलिये उसका उत्पीडऩ किया जा रहा है.लेकिन यह भी एक यथार्थ है कि आज भी देश में दलितों व महिलाओं का उत्पीडऩ बड़े पैमाने में हो रहा है और उस दिशा में अभी बहुत कुछ होना ही चाहिए. केवल कानून बना देने से कुछ भी नहीं हो पा रहा है.

मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले र्में सवर्णों ने एक दलित दूल्हे की बारात घोड़े पर ले जाने के खिलाफ खड़े हो गये और कानून के परिपालन में पुलिस की हिफाजत में उसकी बारात घोड़े पर ही निकलवा दी गयी. कुछ दिनों पहले गुजरात के भावनगर में एक दलित ने घोड़ा खरीद लिया और उस पर बैठकर आने-जाने लगा.

सवर्णों ने उसको गंभीर चेतावनी दे दी कि वह घोड़े पर न बैठें और उसे बेच दें. जब उसने यह नहीं किया तो उस प्रवीण नाम के युवक को जान से मार दिया. अभी उत्तर प्रदेश के कासगंज में यह माहौल है कि दलित की बरात उस सडक़ से नहीं निकल सकती जहां सवर्णों के घर हैं. सडक़ सबकी होती है वह सार्वजनिक है. लेकिन आज भी उत्तरप्रदेश में यह स्थिति है जहां कभी मायावती-बहुजन समाज की सरकार भी रही है.

कासगंज का दलित युवक पढ़ा लिखा है उसने इलाहाबाद हाईकोर्ट में रिट लगा दी और हाईकोर्ट से पुलिस को यह आदेश दिया गया है कि उस युवक की बारात जहां से वह चाहे निकलवायी जाए और कोर्ट के आदेश का परिपालन हो रहा है.

आज भी सैकड़ों गावों में दलित सवर्णों के सामने जूता-चप्पल पहन कर नहीं निकल सकता वह उसे उतारकर हाथ में लेता है. यह सब उस समय हो रहा है जब एससी-एसटी एक्ट लागू है. समाज की मानसिकता को बदलने के लिये अभी सिर्फ कानून बना देना काफी नहीं है. दलित व महिला उत्पीडऩ राष्ट्रीय समस्या है- यह अमानवीय उत्पीडऩ का कलंक व्यवहार में चल रहा है.

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