इहरीश दुबे

सी वर्ष होने जा रहे देश के चार प्रमुख राज्यों के चुनाव महासमर एवं मिशन 2019 की तैयारियों में जुटी भाजपा के लिए दलित आंदोलन इस तरह गले की फांस बन जाएगा, पार्टी के रणनीतिकारों ने इसकी कल्पना भी नहीं की होगी.

आगामी आमचुनाव के लिहाज से भाजपा देश के जिस सूबे को अपनी लिए सर्वाधिक कीमती या वोट उपजाऊ मानती है, वहीं के दलित तबके के चार सांसदों ने न सिर्फ अपनी ही पार्टी की सरकार के खिलाफ़ मोर्चा खोल दिया है बल्कि उसे दलितविरोधी साबित करने में भी जुटे हैं.

पहले इटावा के सांसद अशोककुमार दोहरे और सोनभद्र के सांसद छोटेलाल खरवार ने कड़ी भाषा में मोदी को चिट्ठी लिखी और अब एम्स से एमडी की डिग्री लेकर अमेरिका में पढाई करने वाले पश्चिमी उप्र के सांसद डा. यशवंत सिंह ने भी सीधे पीएम को खत लिखकर भाजपा सरकार की दलित नीति पर गहरे सवाल खडे किए हैं.

इनसे पहले बहराइच की भाजपा सांसद सावित्रीबाई फुले लखनऊ में सभा लेकर चुनौतीनुमा अन्दाज में कह ही चुकी हैं कि वे सांसद रहें या न रहें लेकिन संविधान से छेड़छाड़ नहीं होने देंगी. उप्र सरकार के ही सीनियर मंत्री ओमप्रकाश राजभर भी सरकार व भाजपा की नीतियों पर खुलकर बयानवाजी कर चुके हैं.

इस सवाल का जवाब तलाश करने के लिए चार साल अतीत में लौटना होगा जब यूपीए सरकार को सत्ता से उखाडऩे और दलित वोटबैंक को अपने पाले में करने भाजपा की तरफ़ से लोकलुभावन सब्जबाग दिखाए गए थे, प्रमोशन में आरक्षण के लिए बिल पास करने, बैकलाग पूरा करने और प्राइवेट नौकरियों में आरक्षण दिलाने जैसे वादों को अब भले ही चुनावी जुमला कहा जाए लेकिन भोले-भाले दलित अवाम ने इन वादों पर भरोसा कर भाजपा की झोली इस कदर भरी कि सबसे बड़ी दलित पार्टी होने का भ्रम पाले बैठी बसपा एक अदद सीट तक के लिए तरस गई.

इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि जनसंघ के समय से इस पार्टी में दलित सरोकारों को खास वरीयता पर नहीं रखा गया.जब बंगारू लक्ष्मण को दलित चेहरे के रूप में पेश करते हुए पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया तभी पहली बार यह संदेश गया कि अब तक काँग्रेस पर दलित तुष्टीकरण का आरोप लगाती रही भाजपा की भी अपनी दलित चिन्ताएं हैं.

आरएसएस के विचारक क्रश्णगोपाल ने जब 2012 में अम्बेडकर पर किताब लिखी, इसी के बाद भाजपा की सोच में बदलाव देखा गया. दलित चेहरे को देश का महामहिम बनाना इस नए नजरिए का चरमोत्कर्ष था. हालांकि इनसे पहले दलित समुदाय के ही केआर नारायणन भी राष्ट्रपति रह चुके हैं लेकिन तब उन्हें समर्थन देने वाले दलों ने इसे भुनाने की कोशिश नहीं की थी.

खुद को दलित हितेषी साबित करने की भाजपा की व्यग्रता का अन्दाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि अमित शाह ने देश के शीर्षस्थ पद के लिए अपने दल के प्रत्याशी के नाम का एलान करते वक्त पांच मिनट में पांच मर्तबा दलित शब्द का उल्लेख किया था.दलितों को रिझाने के लिए पिछले चार बरस में भाजपा ने हर जतन किया है.

दलित सांसदों को खुद मनाएंगे पीएम नरेंद्र मोदी

नई दिल्ली. कर्नाटक विधानसभा चुनाव से ठीक पहले अपने दलित सांसदों के बगावती तेवरों को देखते हुए बीजेपी आलाकमान ने उन्हें साधने के प्लान पर काम शुरू कर दिया है. पार्टी का यह भी मानना है कि इनमें से कुछ सांसद ऐसे भी हो सकते हैं, जिन्हें अगले चुनाव में अपना टिकट कटने का अंदेशा हो. इसके बावजूद अब उन्हें साधने के लिए पीएम मोदी खुद दखल देने वाले हैं.

पार्टी ने अब पीएम की मौजूदगी में दलित सांसदों को बुलाकर उनकी शिकायतों का समाधान करने की तैयारी की है. पार्टी को यह भी अंदेशा है कि यदि इसी तरह पत्रों और नाराजगी का सिलसिला जारी रहा तो 2019 में भी बीजेपी के लिए भारी पड़ सकता है.

इसके अलावा कर्नाटक के बाद मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों को लेकर भी पार्टी चिंतित है. बता दें कि बीते एक सप्ताह के भीतर ही पार्टी के चार सांसद एक-एक करके प्रधानमंत्री को दलितों के मुद्दे पर पत्र लिख चुके हैं. यही नहीं, बाद में इन सांसदों ने अपने पत्रों को सार्वजनिक भी कर दिया.

माना कि सावित्री फुले बसपा छोडक़र भाजपा में आई हैं और ओमप्रकाश राजभर खालिश भाजपा के न होकर एनडीए के एक घटक दल की नुमाइंदगी करते हैं लेकिन मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा करने वाले बाकी तीनों सांसद अशोककुमार, छोटेलाल और यशवंत सिंह तो भाजपा के अपने ही हैं और संघ से अनुप्रेरित हैं, फिऱ ऐसी क्या बात हुई कि उन्हें अपनी ही सरकार के लिए मजबूर होना पड़ा.

उप्र के दलित सांसदों के गुस्से के उबाल का अन्दाज सांसद छोटेलाल द्वारा मोदी को लिखे खत में उल्लेखित इस वाकये से लगाया जा सकता है कि जब वे जिले के अफसरों की शिकायत करने सीएम योगी के पास गए तो उन्होंने डाँटकर भगा दिया. छोटेलाल तो उप्र भाजपा के अजा मोर्चे के सूबाई सदर भी हैं, जब संगठन के इतने सीनियर ओहदेदार को इन हालात से दो-चार होना पड़ रहा है तो बाकी की क्या बिसात !

 

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