इस बार संभवत: 2 जून को होने जा रही रिजर्व बैंक की तिमाही मौद्रिक समीक्षा में दालों के भाव विशेष कर ब्याज दरों की घोषणा को प्रभावित कर सकते हैं. लगभग एक दशक से भी ज्यादा का समय हो गया जब रिजर्व बैंक के गवर्नर श्री डी. सुब्बाराव हुआ करते थे तब से ब्याज दरों में ‘फूड इन्फ्लेशनÓ का ग्रहण लगा हुआ है. जिसकी वजह से रिजर्व बैंक का यह स्थाई तर्क हो गया है कि खाद्यान्न महंगाई बहुत ज्यादा है इसलिये बैंकों की पूंजीगत ब्याज दरों को कम नहीं किया जा सकता, लेकिन उन दिनों वजह फसलों का खराब होना नहीं होता था. देश में और वैश्विक स्तर पर आर्थिक मंदी और उपभोक्ता मूल्य वृद्धि का दौर चलता रहा था.

लेकिन इस साल रबी फसलों के समय बेमौसम वर्षा, ओले, आंधी के ऐसे दौैर चले कि जो फसलें बम्पर आ रही थीं किसान समृद्धि को आते नजरों से देख रहा था कि मौसम की मार ने किसानों की फसलों को पानी, ओले व हवा में खत्म कर दिया. गेहूँ की किस्म गिर जाने से आटा मिलों ने विदेशों से गेहूँ आयात कर लिया. देश में दालों का अभाव बना ही हुआ है. देश का दाल उत्पादन हमारी जरूरत से 40 प्रतिशत कम चला ही आ रहा है और इस साल फसलों पर बेमौसम बरसात की मार से दालों का अभाव और बढ़ गया. अभी तक 40 प्रतिशत का अभाव चल रहा है और अब दालों के भावों में एक साल में 40 प्रतिशत भाव भी बढ़ गये हैं. अभाव और मूल्यों दोनों में 40 का आंकड़ा कदमताल कर रहा है. सभी दालों की कीमतें पिछले वर्ष की तुलना में 40 से 50 प्रतिशत तक बढ़ चुकी है. वजह भी यही है देश में उत्पादन और ज्यादा घट गया है और जिन देशों से न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया, म्यानमार से आयात होता है वहां भी दालों की फसल कमजोर आयी हैं और भाव ऊंचे चल रहे हैं.

सरकार जो इन प्रयासों में लगी थी कि खाद्यान्न की मुद्रास्फीति कम हो जाए जिससे रिजर्व बैंक ब्याज दरों के रेपो और रिवर्स रेपो रेट में कमी कर सके. यू.पी.ए. के जमाने से वित्त मंत्री श्री चिदम्बरम से लेकर वर्तमान केन्द्रीय वित्त मंत्री श्री अरुण जेटली बराबर यह कह रहे हैं कि रिजर्व बैंक को सिर्फ खाद्यान्न की मुद्रास्फीति को ही मौद्रिक नीति का आधार नहीं बनाना चाहिए बल्कि उद्योगों की जरूरत को भी नजर में रखा जाना चाहिए, लेकिन रिजर्व बैंक लगातार खाद्यान्न मूल्यों की मुद्रास्फीति पर ही जमा
रहा है.

आशंका यह हो रही है कि जून में भी रिजर्व बैंक खाद्यान्न मूल्य को ही आधार बनाकर ब्याज दर यथावत् रखे. खाद्यान्न के मूल्य शक्कर को छोड़कर सभी कुछ महंगा हुआ है. बैंक अभी तक केवल सी.आर.आर. में ही हर बार 0.25 प्रतिशत की कमी कर रहा है. जून की मौद्रिक समीक्षा पर दालों के बढ़ते भावों से निवेश के लिये पून्जी ब्याज दरों में कमी नहीं होने वाली.

उद्योग-व्यापार जगत को प्रत्यक्ष विदेशी निवेश व उद्यमों से प्रतिस्पर्धा करना है और विदेशों में पून्जी ब्याज दर 2-3 प्रतिशत पर मिलती है और भारत में पून्जी की ब्याज दरें 12-13 प्रतिशत पर जमी हुई हैं.

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