मोदी सरकार की पिछली दो सालों में कई उपलब्धियां पाने का जश्न अभी मनाया ही जा रहा है. लेकिन भारत की आम जनता उपभोक्ता इसे मना नहीं पा रहा है. पिछले 2 सालों में सभी उपभोक्ता वस्तुओं पर आधा प्रतिशत हर बार की दर से तीन बार सर्विस टैक्स बढ़ाया जा चुका है. जो सरकार के हिसाब से कुल डेढ़ प्रतिशत बढ़ा लेकिन उपभोक्ता के हिसाब से हर बार 20 प्रतिशत बढ़कर जीवन भर…. में कुल मिलाकर 60 प्रतिशत सर्विस टैक्स बढ़ चुका है.

दालों का अभाव भी है और उनके भाव 40-60 रुपये से बढ़कर 200 रुपये प्रति किलो तक हो गये. सरकार द्वारा लगातार और अभी तक यही कहा जा रहा है कि दालों का बफर स्टाक बनाया जा रहा है. दालों का आयात भी हो रहा है. देरी इसलिए हो रही है कि राज्य यह नहीं बता रहे कि उन्हें कितनी दाल चाहिए. आम जनता यह नहीं समझ पा रही कि दालों का अभाव हो गया, भाव चढ़ रहे है- फिर राज्य सरकारें उनकी जरूरत को नहीं बता रही. सरकारी तंत्र के जानकार यह जानते है कि ऐसी बातें केवल कुछ भी कहते रहना है इसलिए उसके लिये कही जाती है.

अभी केंद्रीय खाद्य मंत्री श्री रामविलास पासवान ने कहा है केंद्र राज्यों को 66 रुपये किलो अरहर और 82 रुपये किलो उड़द दाल देगा. जिसे वे 120 रुपये में बेचेंगे. राज्य सरकार प्रति किलो 54 रुपये का मार्जिन लेगी जो उसका खर्चा उसे ढुलाई और वितरण में होगा. व्यापार जगत में प्रति बोरा या प्रति बोरी खर्चा लगाया जाता है जो अमूमन 10 रुपये प्रति बोरा आता है, लेकिन राज्य सरकारें प्रति किलो ढुलाई-वितरण खर्चा लगा रही है. ऐसा खर्चा खाद्यान्न के व्यापार में पहले कभी नहीं लगाया गया है.

सरकार तो मुनाफाखोरी में सिरमौर बन रही है. सरकार का कहना है कि जो दाल मिल रही है उसका दाल मिलों में प्रोसेसिंग होगा- वह खर्चा आ रहा है. मध्यप्रदेश ने केन्द्र से 5 हजार टन तुअर दाल मांगी है और इसे कन्ट्रोल (राशन) की दुकानों से बेचा जाएगा. इस समय रिटेल में तुअर दाल 140-170 रुपये प्रति किलो बिक रही है.

शक्कर में भी कीमतें बढ़ती जा रही हैं. मोदी सरकार के पिछले सालों में शक्कर के दाम 40 प्रतिशत बढ़ गये हैं और यह सिलसिला जारी है. कभी किसी जमाने में उत्तरप्रदेश शक्कर उत्पादन में सबसे आगे हुआ करता था, अब महाराष्ट्र और उसके बाद कर्नाटक सबसे आगे हैं. महाराष्टï्र में अल्प वर्षा से गन्ना की पैदावार बहुत प्रभावित हो गयी है. इस साल शक्कर का उत्पादन बहुत कम होगा. लातूर जो गन्ना उत्पादन का क्षेत्र है, वहां टैंकर ट्रेन से पानी पहुंचाया जा रहा है.

शक्कर जो मई 2015 में 2640 रुपये प्रति क्विंटल बिक रही थी वह मई 2016 में 3700 रुपये प्रति क्विंटल…. बिक रही है और तेज रफ्तार जारी है. सरकार को अभी इसी समय शक्कर का आयात कर लेना चाहिए. इंडोनेशिया की शक्कर सबसे सस्ती पड़ती है. यूपीए के शासन काल में भी शक्कर का भारी अभाव हुआ था. श्री शरद पवार खाद्य मंत्री थे- वे जनता की ज्यादा शक्कर मिलों का हित संरक्षण कर गये क्योंकि वे महाराष्टï्र सहकारी शुगर मिलों के पोषक माने जाते हैं.

उन पर यह आरोप लगा था कि उन्होंने आयात में जानबूझकर देर की जिससे भाव बढऩे से शक्कर मिलों को और फायदा हुआ. जो शक्कर आयात की थी कच्ची थी उसकी प्रोसेसिंग यहां की मिलों में होनी थी- वह भी नहीं हो पायी और आयातित शक्कर बन्दरगाहों में पड़ी रही. सरकार को करोड़ों का घाटा हो गया. श्री पासवान को शक्कर का फौरन आयात कर लेना चाहिए और वे इस बात का ध्यान रखे कि वे शरद पवार की तरह ‘कच्ची शक्कर’ न उठा लाये.

इस रबी सीजन में सरकार ने समर्थन मूल्य पर 40,000 टन दालों की खरीददारी की है और 50 हजार टन दालों का आयात चल रह है. दालों में 50 हजार टन का बफर स्टाक रहेगा. 80 हजार टन चना और 20 हजार टन मसूर दाल खरीदी गयी है. सरकार ने उपभोक्ता के हित में एक बड़ा काम यह किया है कि खाद्यान्नों के मूल्य स्थिर रहे, इसके लिए सरकार ने 900 करोड़ रुपयों का प्राइस स्टेबीलाईजेशन फन्ड बनाया है.

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