देश में दालों, विशेषकर तुअर दाल और प्याज में अभाव की ऐसी स्थिति आ गयी कि इसे बिलकुल यथार्थ भावना व तकलीफ मेंं ‘संकटÓ का नाम दे दिया गया. दाल के भाव 150 रुपये प्रति किलो और प्याज के भाव 80 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गये. बाजार में इन दोनों वस्तुओं का जो स्टाक आ रहा है उसकी क्वालिटी भी बहुत गिरी हुई चल रही है.

ऐसे में मोदी सरकार ने भी यू.पी.ए. सरकार के कृषि मंत्री श्री शरद पवार की बेतुकी नीति का अनुसरण किया जब संकट अत्याधिक गहरा गया तब आयात का सोचा गया. आयात-निर्यात घरेलू बाजार की तरह नहीं होता है कि फौरन कर लिया जाये. सौदा तय करने व पानी के जहाजों या ट्रकों से आयात करने में एक लंबा समय लगता है.

यू.पी.ए. के समय शक्कर का भारी अभाव हो जाने के बाद श्री शरद पवार ने रिफाइन्ड की जगह कच्ची शक्कर का आयात किया कि इसे देश की शक्कर मिलों में ही रिफाइन कर लिया जायेगा. लेकिन जब तक यह भारतीय बंदरगाह पर पहुंची तब तक देश की शक्कर मिलों का क्रशिंग सीजन शुरू हो गया. वे अपनी ही शक्कर बनाने लगे और आयात की गयी कच्ची शक्कर बंदरगाहों पर ही पड़ी रही. मिलों ने उसे लिया-उठाया नहीं. कच्ची शक्कर राहत की जगह एक और बड़ी मुसीबत हो गयी.

उस समय और इस समय की सरकारों को यह जानकारी रहती है कि देश में कहां, कब किस चीज का अभाव या आधिक्य होने जा रहा है. लेकिन शासकीय व्यवस्थाओं का ऐसा ढर्रा बना हुआ है कि समय रहते उचित समय पर कभी भी आयात-निर्यात के फैसले नहीं लिये जाते. जब सब गड़बड़ हो जाता है तो हड़बड़ी में गड़बड़ी हो जाती है.

इस समय देश की सबसे बड़ी थोक व्यापार की प्याज मंडी लासलगांव (नासिक) में प्याज के भाव दो साल के रिकार्ड उच्चतम स्तर बढ़कर 6000 प्रति क्विंटल पर पहुंच गये. देश में प्याज का भंडार आधा घटकर 14 लाख टन तक आ गया. दाल-प्याज के भाव ऊपर दौडऩे लगे. दालों में गुजरात व मध्यप्रदेश में उत्पादन में भारी गिरवाट आ गयी. कर्नाटक व महाराष्ट्र में अभी की खरीफ की दाल फसल कमजोर है. इसी समय डालर के मुकाबले रुपया कमजोर होने से आयात भी और महंगा हो गया.

किसानों ने यह राहत जरूर पहुंचायी है कि इस वर्ष देश में दलहनी फसलों का रकबा लगभग 12 प्रतिशत बढ़ाकर एक करोड़ 6 लाख हेक्टेयर कर दिया जो गत वर्ष 94 लाख हेक्टेयर था.

अब इनके आयात का सिलसिला शुरु हुआ है- प्याज अफगानिस्तान से आना शुरु हो गया है और भाव 25 प्रतिशत तक नीचे हो गये हैं. लासलगांव में प्याज 6000 क्विंटल से गिर 4500 प्रति क्विंटल पर आ गयी है. 1000 टन और प्याज के लिये टेंडर जारी कर दिया है.

जब दालों के भाव उछल रहे हैं तब 5000 टन तुअर और 5000 टन उड़द के आयात का आर्डर दिया है जो इस महीने पहुंचने को है. उसके देश भर में वितरण होने पर ही भावों का उतार आने की उम्मीद की जा रही है. इस साल दालों का आयात का काम सरकारी एम.एम.टी.सी. (माइन एंड मिनरल ट्रेडिंग कारपोरेशन) को दिया गया है.

भारत हर साल दालों में देश की जरूरत का 40 प्रतिशत भाग आयात करता रहा है. इस बार आयात 60 प्रतिशत तक जा सकता है. वर्ष 2006 से 2011 (6 वर्षों) में 4 सरकारी संस्थाओं नाफेड, प्रोजेक्ट एंड इक्विपमेंट कारपोरेशन (पी.आई.सी.), एम.एस.टी.पी. और स्टेट ट्रेडिंग कारपोरेशन ने दालों का आयात किया था. इस व्यापार में सरकार मुनाफा नहीं कमाती है. धंधे के हिसाब से इसमें घाटा होता है. गत 6 वर्षों में इन संस्थाओं को आयात व बिक्री में जो घाटा हुआ है उसकी भरपाई में सरकार ने इन्हें 113 करोड़ 40 लाख रुपये दिये हैं.

अभी तक सभी पार्टियों या गठबंधनों की सरकार में जरूरत की वस्तुओं के आयात-निर्यात की नीति बहुत दोषपूर्ण रही है. जिससे सरकारों को भारी आर्थिक नुकसान और जनता को अभावों व चढ़े भावों से भारी तकलीफ पहुंचती रही है. इस व्यवस्था में पूर्ण परिवर्तन
होना चाहिए.

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