nidaनई दिल्ली,  घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें…किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए. मुक़्तिदा हसन निदा फ़ाज़ली ये पूरा नाम है उस बेहद अजीज शख्स का जिन्हें उर्दू शायरी की दुनिया में सदियों तक याद रखा जाएगा. चकाचौंध वाली मुंबई में वह बेहद सादे शायर के तौर पर रहते रहे और सोमवार की सुबह सुकून की नींद सो गए. निदा फाजली को पढऩा, रूबरू सुनना या उनके फिल्मों के लिए लिखे गीत सुनना सबकुछ सीधे दिल में उतरता है.

आसान और गहरी शायरी लिखने की वजह से वह हिंदी प्रेमियों में भी उतने ही पसंद किए जाते रहे जितना उन्हें उर्दू वाले चाहते थे. साल 1946 में निदा साहब मुंबई पहुंचे थे. फिल्म रजिया सुल्तान के लिए दो गीत लिखने का मौका अचानक मिल गया, शायर जानिसार अख्तर का निधन हुआ और कमाल अमरोही साहब ने उनसे गाने लिखवाए. उसके बाद कई सफल फिल्मों के गीतकार के तौर पर उन्हें पहचान मिली.

उनके साथ बहुत बार स्टेज शेयर करने वाले शायर राहत इंदौरी कहते हैं कि निदा साहब का जाना अदब के लिए बहुत बड़ा नुकसान है, 50 बरस से वह लगातार लिख रहे थे, हर विधा में उन्होंने लगातार लिखा है. उन्हें उर्दू का शायर नहीं कहा जाना चाहिए. वह जितने उर्दू में मशहूर थे उससे कहीं ज्यादा गुजराती और हिंदी में पढ़े जाते थे. उन्होंने अपनी अलग जुबान बनाई थीं. वह कहते थे हिंदुस्तान में 3 जुबानें बोली जातीं हैं, पंडित, मौलवी और तीसरी आम आदमी की जुबान तो उन्होंने आम आदमी की जुबान को ही अपनी जुबान बनाया.
बकौल इंदौरी, निदा साहब ने गहरी से गहरी बात आसान शब्दों में कही है. कुछ ही सालों में फैज अहमद फैज, अली सरदार जाफरी, फिराक गोरखपुरी जैसे नाम हमसे जुदा हुए हैं. अंदाजा नहीं था कि इतनी जल्दी निदा फाजली को श्रद्धांजलि देनी पड़ेगी. उनके गीतों में भी शायरी का फ्लेवर मिलता है. निदा ज्यादा फिल्म वाले नहीं बन पाए इसका फायदा अदब को हुआ और हम लोगों को बहुत अच्छा पढऩे को मिला.

ये जरूर कहूंगा कि-
दिल धड़कने का तसव्वुर ही ख्याली हो गया एक तेरे जाने से सारा शहर ही खाली हो गया.
शायर और गीतकार इरशाद कामिल कहते हैं कि निदा साहब ने फिल्मों के लिए भी लिखा और उसके अलग भी लिखा, मुझे लगता है कि उन्होंने कंटेंपरेरी शायरों में अपनी अलग जगह बनाई थी जिसमें बिना भाषाई भारीपन के लोगों की जुबान में शायरी की.

उनकी शायरी में जो गहराई, तीखापन और ख्याल की ऊंचाई होती है वह मिसाल है. यकीनन हम उन्हें भुला नहीं पाएंगे. उन्होंने फिल्मों के लिए जो कुछ लिखा उसके बाद हम कह सकते हैं कि शायर गीतकार भी हो जाए तो भी उसकी कुछ हिस्सा शायर ही रहता है. वह हल्का लिख ही नहीं सकता. धूप फिल्म में उन्होंने लिखा और जगजीत सिंह ने आवाज दी. गीतकारों को उनसे प्रेरणा मिलती रहेगी.
सोशल मीडिया में भी निदा साहब बेहद पसंद किए जाते रहे. ट्विटर पर शायर ग्रुप की फाउंडर राना सफवी कहती हैं कि निदा साहब ने हमेशा आसान भाषा में दिल की बात कही. बिना झिझक सचाई कही. किसी को खुश करने के लिए भी नहीं लिखा. यहां तक कि कभी मजहब भी आड़े नहीं आया उनके लिखने में. रोते हुए बच्चे को जब वह हंसाने की बात करते हैं तो मजहब से परे हो गए. हमेशा इंसानियत की और लोगों को आपस में जोडऩे की बात ही उनकी शायरी में दिखी.

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