हिमालय के संरक्षित वन्यजीव एवं जैविक उद्यानों, हिमनदों के उपक्षेत्रों और सूखी खनकती नदियों से देश के पर्यावरण के लिए मृत्युतुल्य खतरा पैदा हुआ है.
सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से अलकननन्दा जल विद्युत कम्पनी मुकदमें में गठित विशेषज्ञ दल, योजना आयोग के तत्कालीन सदस्य बालकृष्ण चतुर्वेदी का अन्तर मंत्रिमंडलीय समूह, जीबी मुखर्जी कार्यदल, भारतीय भूगर्भीय सर्वेक्षण, केन्द्रीय महालेखा नियंत्रक एवं परीक्षक, केन्द्रीय जल आयोग, चौपरा समिति आदि हिमालय की नदियों को खतरे से साक्षात्कार करवाती हैं. दरअसल सर्वोच्च न्यायालय ने जून 2013 में श्रीकेदारनाथ दाम में अप्रत्याशित जल सुनामी के बाद हिमालय क्षेत्र की जल विद्युत परियोजनाओं के हिमालय और उसकी नदियों पर प्रतिकूल असर की गहन छानबीन के आदेश केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय को दिए. इस विशेषज्ञ दल की सनसनीखेज रपट के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने सभी निर्माण परियोजनाओं पर अंकुश का अ छोड़ा.

भारतीय जनता पार्टी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पवित्र नदी गंगा माता को बचाने लिए धर्मयुद्ध छेड़ा. केन्द्र सरकार में गंगा अभियान का भागीरथी कार्य जल संसाधन मंत्री साध्वी उमा बारती को सौंपा गया. इसके ठीक विपरीत क्या केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर सभी वकिास निर्माण योजनाओं को शीघ्र से शीघ्र हरी झण्डी दिखाने में लगे हैं? जावेड़कर ने मंत्रालय में सभी परियोजनाओं को पर्यावरण स्वीकृति के लिए 4 सदस्यीय विशेषज्ञ दल गठित किया. यह विशेषज्ञ दल पूर्व के विशेषज्ञ दलों की रपट पर अपनी रपट देगा. फलस्वरूप हिमालय के पर्यावरण एवं पवित्र नदियों को विषैले एवं प्रदूषित करनेवाली पन बिजली निर्माण योजनाओं के लिए सरकारी लौह कपाट खुले. स्मरण रहे कि सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तराखंड की 24 प्रमुख परियोजनाओं में से छह की संवेदनशीलता पर विचार किया. ये परियोजनाएं- 171 मेगावाट की लता तपोवन, 300 मेगावट, अलकनंदा बद्रीनाथ, 195 मेगावाट की कोटलीबेल, 128 मेगावाट की झेलम तमक, 24.8 मेगावाट की भीउन्दर गंगा एवं 4.5 मेगावाट की खैरोगंगा हैं. चौपरा समिति की रपट में रहस्योद्घाटन किया गया कि समुद्रतल से 2,200 मीटर से 2,500 मीटर ऊंचाई की उत्तराखंड की विद्युत परियोजनाएं सह हिमनद इलाके में हैं. इस सह हिमनद इलाका परियोजनाओं की संख्या 24 है. विशेषज्ञों के अनुसार सह हिमनद इलाकों में निर्माण कार्य से हिमालय के हिमनदों (ग्लेशियर) का आकार घटता है और हिमाच्छादित पर्वत कम होते हैं. चौपरा समिति के अनुसार: उत्तराखंड सरकार ने 450 जल विद्युत परियोजनाओं से 27039 मेगावाट जिली उत्पादन की महत्वाकांक्षी परियोजनाओं का काम छेड़ा है. राज्य में कुछ किलोमीटर पर गंगा, यमुना, भागीरथी, अलकनंदा, मंदाकिनी, पिन्दारगंगा, श्यामगंगा, धौलीगंगा आदि नदियों के जल का प्रवाह रोककर छोटे बांध बनाने का प्रयास शुरू किया है. देश के सबसे नवीन हिमालय के पर्वतों को निर्ममता से हाईनामाइट से तोड़ा जा रहा है. नदियों का पानी सुरंगों दर सुरंगों से बांधों में जाता है. उत्तराखंड में बांधों सुरंगों का मलबा नदियों में विषाक्त प्रदूषण कर रहा है. नदियों में उद्गम से पानी का प्रवाह कम होने से उत्तराखंड का वनक्षेत्र का विनाश हो रहा है. चारधाम यात्रा की पर्वतीय सड़कों पर धंसते पहाड़ की चेतावनी लिखी है. कहीं यमुनोत्री रास्ते में पर्वत शिखर से पानी आ रहा है.

सह हिमनद क्षेत्र की छह परियोजनाओं से होने वाले भयानक विनाश पर अध्ययन समय की मांग है. उत्तराखंड में तीव्र गति से सिकुड़ते हिमनद, समय असमय बादल फटने (जैसे श्रीकेदारनाथ में ेवं श्रीनगर में हुआ), हिमनदों की अदृश्य झीलें फटने, पहाड़ धंसने, अचानक बाढ़ आदि की त्रासदी का सीधा संबंध पर्यावरण विनाश से है.

पहाड़ी चट्टïानों में विस्फोट दर विस्फोट से हिमालय के कच्चे पर्वत धंसने, टूटने लगते हैं. यही कारण है कि चारधामों के सर्पीले पर्वतीय मार्गों पर हॉर्न नहीं बजाने का निर्देश है. हिमालय में लगातार औद्योगिक गतिविधियां भी ग्लेशियर हिमनदों एवं गंगा के लिए खतरा बढ़ा रही हैं. औद्योगिकीकरण जल बिजलीघर निर्माण से हिमालय का वन क्षेत्र, जैविक विविधता, वन्यजीवन, मीठा पेयजल और हिमनद सभी के लिए संकट की घड़ी है. यह आश्चर्यजनक है कि तत्कालीन पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने झूठी पर्यावरण रपट के आधार पर परियोजाओं को स्वीकृति कैसे दी? सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद भी उत्तराखंड में निर्माण परियोजनाएं क्यों चली?

प्रधानमंत्री मोदी, गंगा मंत्री उमा भारती गंगा बचाने में लगे हैं और पर्यावरण मंत्रालय परियोजनाओं को स्वीकृति क्यों देना चाहता है? भारत की विश्व में पहचान पवित्र गंगा जल से है. गंगा देश की जीवनदायिनी है.

Related Posts: