देश की आजादी के बाद से हम जिन आंतरिक समस्याओं का सामना कर रहे हैं, उनमें नक्सलवाद जटिलतम समस्याओं में सेे एक है. चारू मजूमदार और कानू सान्याल ने पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव से जिस कथित आर्थिक समानता के लिए एवं सामाजिक भेदभाव के खिलाफ वर्ग संघर्ष के आधार पर नक्सलवाद का सिद्धांत गढ़ा था, वह व्यवहार रूप में देश के विभिन्न राज्यों में हिंसक संघर्ष एवं कानून व्यवस्था के लिए गंभीर संकट के रूप में उभर कर सामने आया. नक्सलवाद से निपटने के लिए वर्तमान और तत्कालीन सरकारों ने कई योजनाएं बनाईं. बातचीत के रास्ते एवं सामाजिक जनजागरण से लेकर बल प्रयोग तक को आजमाया गया, लेकिन नक्सलवाद तेजी से अपने पैर पसारता गया. एक वक्त नक्सलवाद सिर्फ पश्चिम बंगाल तक ही सीमित था, लेकिन बहुत जल्द इसने मप्र. से अलग हुए छत्तीसगढ़, बिहार, झारखण्ड, उड़ीसा एवं महाराष्ट्र तक को अपनी चपेट में ले लिया.

हम बात कर रहे हैं छत्तीसगढ़ के दो जिलों सुकमा एवं कांकेर में बीते दो दिनों में नक्सलियों द्वारा किए गए हमलों की जिनमें सात पुलिसकर्मियों के शहीद होने के साथ दस जवान गंभीर रूप से घायल हुए हैं, इसके अलावा नक्सलियों ने कई ट्रकों एवं जेसीबी वाहनों सहित सत्रह गाडिय़ां भी फूंक दी है. छत्तीसगढ़ में कोई पहली मर्तबा नक्सली हमला नहीं हुआ है. करीब दो साल पहले जीरम घाटी में कांग्रेस नेताओं के काफिले पर हुए एैसे ही एक नक्सली हमले में विद्याचरण शुक्ल, नंदकुमार पटेल, उदय मुदलियार जैसे कई प्रमुख नेताओं की शहादत हुई थी. ऐसा लगा था कि इस नक्सली हमले से सरकार ने कोई सबक सीखा है, लेकिन इसके बाद भी नक्सली हमलों से निपटने के लिए कोई ठोस कारगर रणनीति नहीं बनाई जा सकी. जाहिर है कि नक्सलवाद देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए गंभीरतम चुनौती है. पिछले कुछ अर्से से देखा जा रहा है कि हम वैदेशिक मामलों पर तो पूरा ध्यान दे रहे हैं, लेकिन देश के आंतरिक मामलों में यथास्थिति या टालमटोल वाली प्रवृति अपनाई जा रही है. छत्तीसगढ़ सरकार को नक्सलवाद से मुकाबले में दृढ़ता एवं मजबूती का परिचय देना होगा. इसके लिए जरूरी है एकीकृत योजना बनाने की. छत्तीसगढ़ में नक्सल प्रभावित इलाकों में बीएसएफ, सीआरपीएफ, सीआईएसएफ, राज्य पुलिस सहित कई अर्धसैन्य बल तैनात हैं, राज्य पुलिस ने नक्सली इलाकों में कोबरा जैसी कमांडो टीमें भी मुस्तैद कर रखी हैं, लेकिन जिस तरह अचानक नक्सली अपनी शर्मनाक एवं निंदनीय कारगुजारी कर बैठते हैं उससे तो यही बात सिद्ध होती है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में तैनात विभिन्न सुरक्षा बलों के बीच समन्वय का अभाव है. अब तो यह भी लगता है कि छत्तीसगढ़ में राज्य पुलिस एवं सीआरपीएफ के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान भी नहीं होता है. ताजा हमले में घायल एक जवान ने यह कहा भी है कि यदि सीआरपीएफ मौके पर आ जाती तो इतनी क्षति नहीं होती तो क्या पुलिस फोर्स ने सुकमा के जंगलों में नक्सलियों के हिड़मा ग्रुप की मौजूदगी की सूचना सीआरपीएफ को देना जरूरी नहीं समझा था. सुरक्षा बलों के बीच तालमेल की कमी के कारण ही आदिवासी अंचल में बार-बार नक्सली हमले हो रहे हैं.

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि नक्सलवाद सामाजिक विषमता की उपज है. इस समस्या को पूरी तरह पुलिस या सेना के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता. लिहाजा, नक्सलियों के नरमपंथी नेताओं को बातचीत के लिए राजी करना चाहिए, आदिवासियों की समस्याओं और शिकायतों का प्राथमिकता के आधार पर निराकरण करना चाहिए एवं आदिवासियों के बीच इस भावना का प्रसार करना चाहिए कि सरकार और प्रशासन उनका हितचिंतक है.

नक्सली फिर से जिस तरह ताबड़तोड़ हमले कर रहे हैं उससे तो यही लगता है कि नक्सली अभी भी सरकार व प्रशासन को चुनौती देने की स्थिति में है. आईबी ने तीन राज्यों में अलर्ट जारी किया है. आने वाला समय काफी सजगता का है. जरूरत है कि छग सरकार अपनी जिम्मेदारी और कानून-व्यवस्था के प्रति अपनी प्रतिबद्धता समझेगी.