भारत नदियों और गौवंश का देश है. यहां दोनों ही पूज्यनीय है और यहीं दोनों की सबसे ज्यादा दुर्दशा है. दुनिया की तुलना में भारत की गाय सबसे कम दूध देती है. नदियों में यदि बाकी बड़े प्रदूषणों को छोड़ भी दे तब भी पूजा के फूलों से नदियों में गंदगी हो रही है. गणेश और दुर्गा पर्वों पर मूर्ति विसर्जन से नदी-तालाब जहरीले हो रहे हैं. नदियों में अंतिम संस्कार के रूप में न सिर्फ अस्थि विसर्जन होता है बल्कि लाशें भी सैंकड़ों की तादाद में बहा दी जा रही हैं.

भारत में नदियों को जलमार्ग के रूप में कम से कम प्रयोग किया जा रहा है. भारत के तीन ओर समुद्र है लेकिन तीनों तरफ को जोड़ता हुआ जल परिवहन व जल मार्ग नहीं है. इतनी बड़ी समुद्री सीमा में गिने-चुने कुछ ही बन्दरगाह हैं. भारत जहां तीन तरफ समुद्री सीमा का देश है वहीं बड़ी सैंकड़ों व छोटी हजारों नदियों का देश है. लेकिन भारत में यह दोनों जल साधन जो राष्ट्र के बड़े संसाधन (इन्फ्रास्ट्रक्चर) हो सकते थे, अभी तक उपेक्षित पड़े रहे.

मोदी सरकार को यह श्रेय जाता है कि उसने आते ही ‘सागरमालाÓ के नाम से समुद्र तटीय विकास की महती योजना प्रारंभ की है. नदियों के बारे में भी यह संकल्प ले लिया है कि देश में नदियों को जल मार्ग-जल यातायात के रूप में विकसित किया जायेगा. सरकार ने सत्ता में आते ही इसकी घोषणा कर दी थी और इस पर अमल भी शुरू हो गया है.
देश में 101 नदियों को जल यातायात के लिये जल मार्ग के रूप में विकसित किया जा रहा है. 16 बड़ी नदियों पर प्रोजेक्ट रिपोर्ट इसी माह तैयार हो जायेगी और 40 अन्य नदियों की प्रोजेक्ट रिपोर्ट साल के अन्त तक 6-7 महीनों में दिसम्बर तक तैयार हो जायेगी.

नदी जल मार्गों के विकास के लिए केंद्र व राज्य सरकारें मिलकर संयुक्त कम्पनी बनायेंगी. केन्द्र सरकार का इसमें 76 प्रतिशत और राज्यों का 24 प्रतिशत हिस्सा होगा. सड़क यातायात का खर्च एक रुपया पांच पैसे प्रति किलोमीटर आता है, रेल यातायात खर्च एक रुपया प्रति किलोमीटर और जल यातायात पर खर्च मात्र 30 पैसे प्रति किलोमीटर होता है. नदी जल मार्ग यातायात देश के यात्री व मालवाहक यातायात के रूप में सबसे सस्ता है. इसके बाद भी नदियों में बहुत ही छोटे स्थानीय स्तर का जल यातायात होता है. आमतौर से यह एक तट से दूसरे तट तक जाने का होता है. जल और सड़क यातायात देश के आर्थिक विकास में सबसे महत्वपूर्ण और सक्रिय भूमिका निभाते हैं.

सड़क यातायात ट्रक ट्रांसपोर्ट के जरिये निजी क्षेत्र में रहा, लेकिन राज्य सरकारों ने यात्री सड़क परिवहन राष्टï्रीयकरण करके राज्य परिवहन बना लिया. यात्री परिवहन बड़ी आमदनी का धंधा है इसलिये केंद्र के पास रेलवे और एयरवेज है उसी तर्ज पर राज्यों ने सड़क यात्री परिवहन को अपनी आमदनी का बड़ा जरिया बनाना चाहा. मुनाफे के इस भारी धंधे में भी राज्य सरकारें भारी घाटा खा गयीं और उसका फिर से निजीकरण कर दिया. रोडवेज कारपोरेशन बंद कर दिये गये. मध्यप्रदेश सड़क यात्री परिवहन में घाटा 5 करोड़ रुपये रोज तक पहुंच गया. मुनाफे के धंधे में स्टेट का एकाधिकार बनाकर भी घाटा खा गये. सड़कें बनाना जो सरकार का ही काम था, वह भी पी.पी.पी. और बी.ओ.टी. के आधार पर निजी क्षेत्र को सौंप दिया. ऐसे वातावरण में केंद्र राज्यों के साथ नदी जल मार्ग विकास के लिये संयुक्त कम्पनियां बनाने जा रहा है. केन्द्र को इस संदर्भ में राज्यों के साथ नदी जल मार्ग पर संयुक्त कम्पनी बनाने पर पुन: विचार करना चाहिए. ये रोडवेज नहीं चला जाये सड़क निर्माण में निजी क्षेत्र में खुद सहभागिता कर रहे हैं. वे जल मार्ग में क्या योगदान दे सकेंगे. नदियां तो अपने आप में निर्धारित मार्ग हैं. उनके बीच-बीच में जो चट्टानें हैं उन्हें ब्लास्ट करके हटाना होगा और जहां नदी उथली है उसे तल की खुदाई करके गहरी करना होगा. किनारों पर बस स्टैण्ड या रेलवे स्टेशनों की तरह नदी स्टेशन बनाने होंगे. माल लदान व उतारने की व्यवस्था करनी होगी.

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