थिएटर ओलम्पिक्स के दसवें दिन बंगला एवं हिन्दी नाटकों का मंचन

भोपाल,

राजधानी में आयोजित थिएटर ओलम्पिक्स पूर्णता की ओर अग्रसर है और दो तिहाई अवधि पूर्ण कर चुका है. इस बीच शहर के दर्शकों को नाटकों के बहुआयामी रंगों से रूबरू होने का अवसर मिला है. व्यापक चर्चाओं के कारण नये दर्शक नाटकों को देखने के लिए आ रहे हैं जिनके कारण भारत भवन और रवीन्द्र भवन के सभागार भरपूर उपस्थिति से गुलजार हैं.

इसी क्रम में शुक्रवार को भारत भवन में बंगला नाटक किनू कहारेर थेटर और रवीन्द्र भवन में हिन्दी नाटक द केयर टेकर का मंचन हुआ. किनू कहारेर थेटर बंगला देश की प्रस्तुति था जिसके निर्देशक काली तौफीकुल इस्लाम थे. मनोज मित्र की कृति पर आधारित इस नाटक की प्रस्तुति बंगलादेश की संस्था प्राच्यनट की ओर से थी.

यह नाटक व्यवस्था पर गहरा कटाक्ष है. नाटक की विषय वस्तु ऐसी है जिसमें राजा अपने मित्र जो कि राज्य का वजीर भी है, दुराचरण के इल्जाम के बाद भी बचाना चाहता है.

राज्य की प्रशासनिक और कानून व्यवस्था सम्हालने वाले गवर्नर ने राजा को चेतावनी दे रखी है और चौदह कोड़े का दण्ड तैयार है लेकिन यह षडय़ंत्र रचा जाता है कि एक गरीब, निकम्मे आलसी आदमी से अपराध स्वीकार कराकर उसे सजा दी जाये और कोड़े खाने के बदले में रुपये पैसों से भरपायी. एक बार एक आदमी तैयार क्या हुआ, हर अपराधी उसे पैसे देकर कोड़े लगवाने लगता है.

अब जब एक बार राजा खुद किसी अपराध में फंसता है और उसको वही निकम्मा आदमी याद आता है जब उसके प्रयास विफल साबित होते हैं.

यह नाटक एक करारा व्यंग्य भी है जिसे निर्देशक, सधे हुए पात्रों की सहायता से नाटक में इस्तेमाल करने में सफल होता है. कलाकारों में मोहम्मद मोनिरुल हक, रंतिकविपु, मो अबू वकार, चेतोन रहमान वाषा, जगन्मय पॉल, मोहम्मद मिजानुर्रहमान का अभिनय सराहनीय है. निर्देशक चूँकि रंगमंच के सभी आयामों में दक्ष हैं इसलिए प्रत्येक पक्ष में अपनी उपस्थिति प्रमाणित करते हैं.

रवीन्द्र भवन में द केयर टेकर नाटक का निर्देशन राज बिसारिया ने किया था. वे लखनऊ में निवास करने वाले वरिष्ठ नाटककार हैं एवं मध्यप्रदेश शासन के राष्ट्रीय कालिदास सम्मान से सम्मानित भी. उनका यह नाटक हेराल्ड पिन्टर की रचना थी और प्रस्तुत करने वाली संस्था थी द थिएटर आट्र्स वर्कषॉप.

एक ट्रेजिक कॉमेडी के रूप में प्रस्तुत इस नाटक में सत्ता, राजभक्ति, निष्कपटता और भ्रष्टचार में लिप्त दो भाइयों के जीवन को देखा गया है. सहायक किरदार में प्राय: उपस्थित रहने वाला एक और चरित्र नाटक का दिलचस्प भाग है.

निर्देशक इस नाटक की प्रस्तुति के केन्द्र में हैं. इसमें हम चरित्रों को उनके अतिरेकों में देखते हैं. कथ्य को बरतने का लहजा साधारण है लेकिन अन्त की ओर बढ़ते बढ़ते नाटक बहुत रोचक होता चला जाता है. कलाकारों में आषीष तिवारी, प्रफुल्ल त्रिपाठी, ललित सिंह पोखरिया आदि की भूमिका अनुभव का प्रमाण हैं. निर्देषकीय कसौटी पर भी नाटक बेहतर है.

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