देश में सभी को यह ज्ञात था कि दिल्ली बलात्कार कांड का जघन्यतम अपराधी नाबालिग होने के कारण 20 दिसंबर को छूट जायेगा. उसके बाद भी संसद ने उस पर काफी पहले यू.पी.ए. के शासन काल में लाया जा चुका विधेयक पारित नहीं किया और दो दिन के फर्क से वह जघन्य अपराध से बरी हो गया. वह तो बरी हो गया लेकिन देश की सरकार व संसद इस बात की अपराधी हो गयी कि उसने जानबूझकर देश की भावना को आहत किया और उसकी ही वजह से एक जघन्य अपराधी पूरे देश की कानून व्यवस्था की खिल्ली उड़ाता हुआ रिहा
हो गया.

कानून भी ऐसा बनाया गया है कि वह अभी भी लचर है. इसमें अपराधों के आधारों पर नाबालिगों का वर्गीकरण तो ठीक है. आयु भी घटाकर 18 से 16 वर्ष कर दी. लेकिन सजा में फर्क करना बिल्कुल बेतुका लग रहा है. यह तो कहा गया है कि जो बलात्कार, हत्या व तेजाब फेंकने जैसे जघन्य अपराध का दोषी होगा उसे अदालत में वयस्क ही माना जायेगा, लेकिन उसे जो सजा दी जायेगी वह उसी मामले जो वयस्कों को सजा दी जायेगी वह उसे नहीं दी जायेगी. उसे वयस्क भी माना जायेगा पर वयस्क की सजा नहीं दी जायेगी. यह तो कानून का तमाशा है. वयस्क मानने के बाद भी वयस्क और नाबालिग फर्क तो बना ही रहेगा. उसे फांसी तो क्या आजीवन कारावास की भी सजा नहीं दी जा सकती है. केवल सजा की अवधि बढ़ाकर 7 साल तक कर दी है.

यह भी एक यथार्थ है कि भारत की कानून व्यवस्था ही ऐसी है जो देश में अपराधी को संरक्षण देती है और अपराध को बढ़ावा मिलता है. जो सजा काटकर बाहर आता है- वह उसी दिन फिर अपराध करने लगता है. यहां तक होता ही है कि जमानत मिलने पर वह अपराध करने लगता है. मामला लम्बी पेशियों में ट्रायल कोर्ट में और फिर अपीलों में बरसों खिंचता रहता है. हाल ही में मध्यप्रदेश के जेल सुपरिटेन्डेंट आय से अधिक धन सम्पत्ति में पकड़े गये. जेल में सभी सुविधायें रिश्वत का भुगतान करने में मिल जाती है. यह मान्यता भी एक आयना है कि आम आदमी को अदालत से न्याय पाने का भरोसा नहीं होता लेकिन अपराधी को अदालत से राहत पाने का भरोसा होता है.

नाबालिग विधेयक में भी जो संशोधन किये गये हैं, वह भी समस्या के मूल तक नहीं पहुंचते हैं. सरकार को इस बात का इंतजार नहीं करना चाहिए कि जब कोई नाबालिग अपराध करेगा, तभी उसे सुधारने-बसाने का प्रयास किया जायेगा.
यह भी नेशनल क्राइम डाटा में आ चुका है कि नाबालिग अपराधियों की संख्या और उनके द्वारा किये जघन्य अपराधों में 50 प्रतिशत से ज्यादा वृद्धि हो चुकी है.

अब सरकार को हर आवारा नाबालिग को अपराध करने से पहले ही रिमान्ड होम लाकर उसकी स्थिति और परिस्थिति को समझकर सुधारने-बसाने का काम शुरु करना है. वयस्क अपराधी गैंग ऐसे बच्चों को अपनी गैंग में लेकर उनसे घृणित अपराध करते हैं और अपराधी बनाते हैं. बच्चों को अगवा कर उनके मूल स्थान से दूर ले जाकर अपराधियों को अपराध कराने के लिये बेच देेते हैं. दिल्ली के अपराधी की पूरी केस हिस्ट्री उजागर की जाए कि वह अपराध से पहले किन-किन परिस्थितियों से गुजर कर ऐसा जघन्य अपराधी बना. सुधार मतलब केवल टेलरी सिखाना और सिलाई मशीन देना नहीं होता है.

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