महंगाई के लगातार चले आ रहे दौरों से त्रस्त देश के मध्यम वर्ग की केन्द्र की मोदी सरकार ने आर्थिक परेशानियों में ही स्फीति (इन्फिलेशन) कर दिया. इंकम टैक्स में कोई छूट नहीं, लेकिन वेल्ट टैक्स खत्म कर सुपर धनाढ्य वर्ग पर दो प्रतिशत का सरचार्ज लगा दिया. मध्यम वर्ग से कह दिया कि वे अपना ख्याल खुद रखें और बजट को स्वरूप दिया उसमें कह दिया कि धनाढ्य और कारपोरेट वर्ग का ख्याल सरकार खुद रख रही है.

सर्विस टैक्स बढ़ाकर उपभोक्ता जीवन व बाजार में महंगाई से सरकार खुद ही अपने बजट में स्फीति ले आयी है. अब आम आदमी बीमार पडऩे पर भी बढ़ते सर्विस टैक्स की पेनाल्टी लगेगी और होटलों में जाकर खाना खाना भी महंगा हो गया. शहरों में एक बड़ी आबादी जो नौकरी या घरेलू परिस्थितियों में घरों से दूर नौकरी की जगह रहते हैं वे होटल में ही खाते हैं.

आयकर में कम या ज्यादा होना तो इस पर निर्भर हो जाता है कि उस व्यक्ति या संस्थान की आमदनी बढ़ी या घटी है. लेकिन सर्विस तो एक सी रहती है. उस काम में देने वाले की लागत लगती है और मुनाफा शामिल होता है और पाने वाला सेवा के बदले भुगतान करता है. सर्विस तो व्यवसायी और खरीददारी का काम है बिना इसके धंधा होगा ही नहीं. सर्विस टैक्स एक स्तर पर स्थाई होना चाहिए उसमें प्रतिशत का बढ़ाये जाने का कोई औचित्य ही नहीं है. प्रधानमंत्री श्री नरसिम्हा राव के शासनकाल में उनके वित्त मंत्री श्री मनमोहन सिंह ने सर्विस टैक्स प्रारंभ किया था. उस समय केवल टेलीफोन बिल की राशि पर 5 प्रतिशत लगाया गया है. आज जीवन की हर जरूरत की चीज पर सर्विस टैक्स का दायरा बढ़ाते ले आये हैं और सर्विस टैक्स की दर भी 5 से बढ़ती हुई 14 प्रतिशत तक आ गयी है.

देश में परम्पराओं में सोना में निवेश चला आ रहा है. जो देश की अर्थव्यवस्था से बाहर रहता है और राष्टï्र के लिये उत्पादनहीन होता है. इसे अब बैंकों में रखने पर उस पर ब्याज दिया जायेगा. इस योजना में कई फायदे हैं एक तो लोगों का गोल्ड स्टाक बैंकों में सुरक्षित रहेगा और ब्याज कमायेगा और बैंकों के माध्यम से देश की अर्थव्यवस्था के चलन में रहेगा. लेकिन इसे भी माना जाना चाहिए कि जिन्हें आमदनी छिपाना है वह इसके बाद भी सोना छिपा कर रखेंगे. मकान, बीमा, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवायें सभी महंगी कर दी गयी हैं.

अन्तरराष्टï्रीय तेल बाजार में पेट्रो क्रूड के भाव तो रिकार्ड तेजी से गिरे थे, लेकिन देश में केन्द्र व सरकारों ने पेट्रोल-डीजल पर टैक्स बढ़ाकर अपनी आमदनी तो पूरी कर ली लेकिन भाव गिरने का लाभ उपभोक्ता को नहीं मिलने दिया. जबकि सरकार ने खुद ही पेट्रोल-डीजल को सरकार के मूल्य नियंत्रण से मुक्त कर उसे बाजार भावों पर आधारित किया और टैक्स बढ़ाने की नीति अपनाकर उस नीति को अप्रभावी कर दिया. अब श्री जेटली ने जो केन्द्रीय बजट प्रस्तुत किया है उससे पेट्रोल-डीजल की कीमतें और ऊपर बढ़ गयीं.

लगता है मोदी सरकार का एक ही आर्थिक लक्ष्य है कि देशी और विदेशी प्रत्यक्ष निवेश पून्जी बढ़ाओ और कार्पोरेट अर्थव्यवस्था चलाओ- मध्यम वर्ग से कह ही दिया है कि वे अपना ख्याल खुद रखें.

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