भारत का निर्यात पिछले 6 महीनों से लगातार गिरता जा रहा है. गत मई माह में यह 20.19 प्रतिशत घटकर 22.34 अरब डालर का रह गया. जबकि गत 2014 वर्ष के नवंबर में यह 7.97 प्रतिशत बढ़ा था. लेकिन उसके बाद से इसमें लगातार गिरावट आ रही है.

फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट आर्गेनाईजेशन्स (एफआईईओ) ने इस पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि सरकार को तुरन्त ही स्थिति को सम्हालना और सुधारना होगा. देश की आर्थिक स्थिति बिगडऩे के आसार बन गये हैं. निर्यात में 21 प्रतिशत की गिरावट 6 साल की सबसे बड़ी गिरावट है.

निर्यात बढ़ाने का एक फार्मूला यह भी है कि हमारा आयात कम हो. आयात कम होने से ही विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ता है तो निर्यात का वातावरण भी बढऩे लगता है. चीन के साथ भी हमारा व्यापार संतुलन ठीक नहीं है. हम वहां से आयात ज्यादा और निर्यात कम कर रहे हैं. भारत-चीन को कपास का भारी निर्यात करता है. इसकी मांग में कमी होने से भारत में कपास की कीमतें भी गिरने लगती हैं. यह माना जा रहा है कि भारत का कपास निर्यात अत्याधिक रूप से चीन पर आश्रित हो गया है जो व्यापारिक दृष्टिï से ठीक नहीं है. रेडीमेड कपड़ों के निर्यात में बंगलादेश दुनिया में बहुत आगे है. उसकी कपास की जरूरत भी ज्यादा है. भारत को कपास निर्यात को बढ़ाने के लिये दूसरे देशों खासकर अफ्रीकी देशों में बाजार तलाशने होंगे.

भारत का तीन वस्तुओं में भारी आयात है. यह भारत के विदेश व्यापार की बड़ी कमजोरी है. हम हमारी जरूरतों में पेट्रो क्रूड 80 प्रतिशत, रसोई में खाने के तेल 60 प्रतिशत और दालों का 40 प्रतिशत भाग स्थाई रूप से आयात करते आ रहे हैं. बीच में महंगी पूंजी और कम निवेश से औद्योगिक उत्पादन और निर्यात काफी कम हो गया. इंजीनियरिंग माल का काफी निर्यात जम गया था उसमें भी औद्योगिक शिथिलता से बहुत कमी
आई है.

पूंजी की बैंक दरों पर एक अजीब सी स्थिति बनी हुई है. केंद्र सरकार हर साल लगभग सभी कृषि उपजों के समर्थन मूल्य बढ़ाती है इसलिए खाद्य वस्तुओं के भाव भी बढ़ते जा रहे हैं. रिजर्व बैंक इसे खाद्य वस्तुओं में महंगाई और मुद्रास्फीती मानकर बैंक दरों को इससे जोड़कर उन्हें कम नहीं करता है.
निवेश बढ़ाकर औद्योगिक उन्नति होने पर भी यह सबसे ज्यादा जरूरी होगा कि उन उत्पादों का विदेशी बाजार निर्यात के लिए तैयार है.

भारत की मुख्य निर्यातक वस्तुएं कपास, प्याज, शक्कर, गेहूं, बासमती चावल, इंजीनियरिंग गुड्स, आभूषण और रत्न, केमिकल, दवाईयां, चमड़ा और चमड़े से बनी वस्तुएं, बिजली व प्लास्टिक के सामान, इन वस्तुओं के निर्यात में भी कमी दर्ज हुई है. इसका एक कारण लागत और ढुलाई का खर्च काफी ज्यादा है. बरसात के दिनों में पूरे देश की सड़क इतनी खराब हो जाती है कि भारी ट्रक ट्रांसपोर्ट में चौगुना समय और ईंधन की लागत बढ़ जाती है.

महंगे कपास से देश की टेक्सटाइल इंडस्ट्री संकट में है. देश के कपड़ा उद्योग को रोज 85 हजार से 90 हजार गांठ कपास की जरूरत है और कॉटन कारपोरेशन उन्हें सिर्फ 40 हजार गांठ देता है. देश में कॉटन के दाम अंतरराष्टï्रीय भावों के मुकाबले 10 से 15 प्रतिशत ज्यादा हैं. लागत ज्यादा होने से विदेशों में निर्यात प्रतिस्पर्धा में टिकना मुश्किल होता है. कपड़ा निर्यात में हम बंगलादेश से भी पीछे हैं. निर्यात में लगातार गिरावट से रुपया भी कमजोर हो जायेगा.

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