आयोजन के दृष्टिï से मुंबई में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने ‘मेक इन इंडियाÓ सप्ताह का आयोजन किया लेकिन विशालता में यह निवेश का कुंभ रहा. इसमें 68 देशों के विदेशी सरकारी प्रतिनिधि मंडल, 72 देशों के कारोबारी प्रतिनिधि मंडल, 2500 विदेशी और 8000 देसी कंपनियों ने भाग लिया.

इसमें स्वीडन व फिनलैंड के प्रधानमंत्री और पोलैंड के उपप्रधानमंत्री भी आये हुए है. देश के 17 राज्यों की सरकारें व प्रतिनिधि शामिल हैं. सप्ताह के पहले दिन ही 64,000 करोड़ रुपयों के करार हुए.

‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम का वैश्विक प्रारंभ सितंबर 2014 में हुआ था और अब तक इन 18 महीनों ने इस कार्यक्रम में विश्व में अपना स्थान बना लिया है. देश में अब तक 48 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश बढ़ा है.

अब भारत में आर्थिक विकास और विदेशी निवेश के लिये बदनाम शासकीय दफ्तरों के ‘रेड टेप’ प्रणाली के जगह औद्योगिक विकास के लिये ‘रेड कारपेट’ की प्रणाली लायी गयी है. देश के चोटी के उद्योगपति रतन टाटा, साइरस मिी, अम्बानी बंधु, कुमार मंगलम बिड़ला, पीरामल, महेन्द्रा. अडानी सहित सभी उद्योगपित भी निवेश व विदेशी सहयोग में आगे आ गये है.

सप्ताह का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि देश के देसी व विदेशी निवेशकर्ता व उद्योगपतियों के लिये प्रशासकीय मार्ग सुगम किया जा रहा है. पारदर्शी कर व्यवस्था, सरल लाइसेंसिंग और आसान क्लियरेंस मिलेगा. पिछले तारीख में कोई कर नहीं लगाया जायेगा. ‘मेक इन इंडिया’ देश का अब तक सबसे बड़ा ब्रांड है. भारत विदेशी निवेश के लिये सबसे ज्यादा खुला देश है.

भारत में विदेशी निवेश उस समय बढ़ रहा है जबकि दूसरे देशों में विदेशी निवेश घटा है. भारत के वैश्विक ग्रोथ में 12.5 प्रतिशत का योगदान है. औद्योगिक मामलों के तुरन्त निपटारे के लिये कमर्शियल कोर्ट और हार्ईकोर्ट में कमर्शियल डिवीजन बैंच बनायी जा रही है. जी.डी.पी. मेन्युफेक्चरिंग की हिस्सेदारी 17 से बढ़कर 25 प्रतिशत करने का लक्ष्य है. इस समय भारत में निवेश का सर्वोत्तम समय है और देश व विदेश के निवेशकों को इसका पूरा लाभ उठाना चाहिए.

भारत में 3 बड़ी बातें यह है कि वहां डेमोक्रेसी (प्रजातंत्र) जनसंख्या में युवा वर्ग सबसे ज्यादा और विशाल भू-भाग व आबादी होने के कारण यह अपने आप में दुनिया का बहुत बड़ा बाजार है. देश में जी.डी.पी. की विकास दर 7 प्रतिशत से ज्यादा है.

इस आयोजन से देश में 4 लाख करोड़ रुपयों का निवेश जुटाने का लक्ष्य तय किया गया. इस आयोजन का बजट 80 करोड़ रुपयों का है.

विदेशी निवेश और उन्नत आर्थिक विकास के अति उत्साह में इस बात पर ध्यान व सावधानी रखना होगी कि इसमें नकारात्मक पहलू न आये. नये कारखाने तो लगे लेकिन जो लगे या पहले से लगे हैं- वे बन्द नहीं होना चाहिए. खुलता कारखाना तो नजर में आता है लेकिन जो कारखाना बन्द होता है वह ‘चुपचाप’ की परिभाषा में आता है. कुछ दशकों पूर्व भारत में एक दौर आया था कि देश की तमाम कपड़ा मिलें ‘सिक मिल’ के नाम पर बड़े पैमाने पर बन्द हो गयीं.

केन्द्र व राज्य सरकारों को नेशनल टेक्सटाइल कार्पोरेशन (एनटीसी) बनाकर उन्हें चलाना पड़ा. ये सरकारीकरण के बावजूद भी घाटे में ही रहीं और सरकारों पर बोझ बन गईं और उन्हें बन्द किया गया.

हाल ही में भारत का बहुत ही प्रतिष्ठित औद्योगिक उत्पादन का केन्द्र सरकार ने उसका ‘एचएमटी’ (हिन्दुस्तान मशीन टूल्स) बन्द कर दिया. इसने घड़ी, टेक्टर व प्रिंटिंग प्रेस बनाने में काम जमाया और नाम कमाया था. आज घड़ी, टेक्टर व प्रिंटिंग प्रेस निर्माण के क्षेत्र में बड़े उद्योग घरानों ने कारखाने डाले हैं और मुनाफे में चल रहे हैं. तब यह सरकारी कारखाना क्यों घाटे में चला और बन्द किया जा रहा है. उसकी विस्तृत जांच सी.ए.जी. से आडिट व जांच करायी जाए. इसको बन्द करना केन्द्र सरकार का इस दिशा में नकारात्मक चेहरा है.

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