rajanहांगकांग,  रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर रघुराम राजन ने शुक्रवार को कहा कि एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भारत के सामने निवेश में गिरावट का संकट है जिससे देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान हो रहा है। राजन ने कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था सार्वजनिक एवं निजी निवेश में गिरावट के दौर से गुजर रही है। हालांकि, उन्होंने उम्मीद जतायी कि विदेशों से आने वाले पूंजी प्रवाह की मदद से इससे उबरा जा सकता है।

उन्होंने कहा कि पूंजीगत निवेश घटने से विकास की क्षमता का पूर्ण इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है। कंपनियों में उत्पादन क्षमता से 30 प्रतिशत कम हो रहा है और निजी कंपनियां नई परियोजनाओं में निवेश के लिए किसी जल्दबाजी में नहीं हैं।
राजन ने कहा कि विकास के मोर्चे पर मुख्य चिंता निवेश है। निजी निवेश काफी कम हो गया है और सार्वजनिक निवेश की भी यही स्थिति है। उन्होंने कहा कि विकास और निवेश में गिरावट के बावजूद मजबूत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) और ढांचागत निवेश निजी निवेश को प्रोत्साहित कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि एफडीआई में बढ़ोतरी हो रही है- घोषणाओं के मामले में भी और वास्तविक निवेश के मामले में भी। जैसी ही मांग थोड़ी मजबूत होगी नयी परियोजनाओं की शुरुआत अपने-आप देखने को मिलेगी। राजन ने भारतीय मुद्रा रुपये के सही स्तर पर टिप्पणी करने से इनकार करते हुये कहा कि नीति निर्माताओं को वैश्विक केन्द्रीय बैंकों द्वारा नीतियों को आसान करने के मद्देनजर वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़ रहे कर्ज के बोझ पर भी नजर रखनी चाहिये। उल्लेखनीय है कि वह उदार नीतियों पर अमल करने वाले फेडरल रिजर्व समेत अन्य केन्द्रीय बैंकों के मुखर आलोचक रहे हैं। उनका मानना है कि सस्ती मुद्रा से वैश्विक वित्तीय तंत्र के सामने कर्ज का बोझ खतरनाक स्तर तक बढ़ता जा रहा है और इससे उभर रहे बाजारों के सामने संकट उपस्थित हो रहा है। आरबीआई गवर्नर ने कहा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था लंबे समय तक सुस्त विकास के दौर से नहीं गुजरेगी। उन्होंने कहा कि मुझे संदेह है कि यह 20 वर्षों वाली एक घटना है और मुझे लगता है कि हम इससे बाहर आ रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि केन्द्रीय बैंक ने चालू वित्त वर्ष में भारत की विकास दर का पूर्वानुमान 7.6 प्रतिशत से घटाकर 7.4 प्रतिशत कर दिया है। इससे पहले सरकार ने भी अपना पूर्वानुमान 8.5 प्रतिशत से घटाकर आठ प्रतिशत किया था। हालांकि, यह अब भी चीन के विकास दर से अधिक है। वहीं, इस महीने की शुरुआत में भारत ने एफडीआई नियमों में ढील देते हुये 15 प्रमुख क्षेत्रों के लिए इसके नियम आसान बनाये थे। इस साल जनवरी से जून के दौरान भारत में एफडीआई पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 30 प्रतिशत बढ़कर 19.4 अरब डॉलर पर पहुंच गया था जिसे सरकार ने अर्थव्यवस्था में निवेशकों के बढ़ रहे विश्वास का प्रमाण बताया था।

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