नेपाल में अब तबाही का दौर खत्म हो चुका है और जैसा वैज्ञानिक आधार पर होता है वहां इस समय कम तीव्रता के ”ऑफ्टर शाक” आ रहे हैं. लोग अपने ही घरों के सामने और खुले मैदानों में तम्बू ताने पड़े हैं- वे घरों के अंदर इन ”ऑफ्टर शॉक” की वजह से जाने से डरे हुए हैं. वहां सरकार और जनता पूरी तौर पर बचाव व राहत में जुट गये हैं. लोग सड़कों और बस्तियों से निकल आये हैं. बचाव कार्य तेजी से चल ही रहा है. परेशानी में परेशानी आती ही है. इस वक्त सबसे अहम् प्रश्न यह है कि जो लोग मैदानों में पड़े हैं उन तक खाना-पानी और अन्य जरूरी चीजें पहुंचाना होता है. आपदा के समय जो दूरदराज हो जाते हैं उन तक रसद पहुंचाना भी बड़ी मुश्किल का काम होता है. भारत वायुमार्ग से निरंतर वहां खाने के पैकेट पहुंचाता जा रहा है. भारत के सामने यह अपना ही मामला की भावना बनी हुई है.

भूकम्प के मामले में विज्ञान ने अभी सीमित प्रगति ही की है. भूकम्प के बाद इतना पता हो जाता है कि उसका केंद्र कहां था और कितनी गहराई में था. लेकिन यह अनुमान नहीं होता है कि कब और कहां आयेगा. लेकिन तूफानों के मामले में पूरी जानकारी हो जाती है कि कहां तूफान उठा है- किस दिशा में किस रफ्तार में बढ़ रहा है और कब कितने बजे तक किस तट तक पहुंच जायेगा. तटों पर चेतावनी के सिग्नल लग जाते हैं- तटों से आबादी सुरक्षित स्थानों पर भेज दी जाती है. सुनामी की जानकारी मुश्किल से 5 मिनिट पहले हो जाती है- उसमें थोड़े समय में खतरे की चेतावनी भर दी जाती है.

वैज्ञानिकों ने यह जरूर कहा है कि उन्हें यह आशंका ही रही थी कि नेपाल के क्षेत्र में भूकंप आ सकता है. इसका अनुमान इस आधार पर था कि जमीन के अंदर के दो प्लेटे आपस में टकराने वाली थी. यह प्रक्रिया एक अर्से से चल रही है. इसके कारण हिमालय पर्वत श्रृंखला हर साल पांच मिलीमीटर ऊपर होती जा रही है. पिछले 7 वर्षों से यह देखने में आ रहा है कि भूगर्भीय परिवर्तनों में कुछ वृद्धि हो गयी है. खासकर ज्वालामुखी काफी मात्रा में सक्रिय हो गये है. प्रशांत महासागर के राष्टï्रों के राष्टï्रों के तटों को ‘रिंग आफ फायरÓ भी कहा जाता है. हाल ही में चिली में एक ज्वालामुखी पूरी विकरालता से आग उगल रहा है. जापान में इंडोनेशिया में भी ज्वालामुखी हाल ही फट पड़े हैं.

नेपाल के इस विनाशकारी भूकंप का वैज्ञानिक आधार भूगर्भीय प्लेटों का टकराना माना जा रहा है. इन्हीं वैज्ञानिकों ने यह भी आशंका व्यक्त की है कि अभी सबसे बड़ा भूकंप आना बाकी है. इसका अर्थ यह होगा कि उसकी विनाशकारी तीव्रता इस समय के भूकंप की 7.9 रिएक्टर स्केल से ज्यादा होगा. जब अभी इसके प्रभाव से भारत में कर्नाटक और केरल तक जमीन हिल गयी तो उस संभावित बड़े भूकंप का प्रभाव उस समय भारत पर भी और ज्यादा पड़ सकता है. इसके लिये यह जरूरी है कि उस आशंका को ध्यान में रखते हुए हम अपने सुरक्षा, बचाव व राहत के सभी संसाधनों को युद्ध स्तर की तैयारी के अनुरूप कर लेना चाहिए. भारत के अंडमान-निकोबार द्वीप में जो एक ज्वालामुखी है जो लगभग 6 वर्ष …… फटा था.

Related Posts: