दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में एक आपराधिक पृष्ठभूमि की घटना व्यर्थ व अनर्थ में राजनैतिक मुद्रा बनी हुई है. एक पक्ष इसे देशभक्ति और देशद्रोह से जोड़ रहा है तो दूसरे पक्ष उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता व अधिकार से जोड़
रहे है.

विश्वविद्यालय की जांच रिपोर्ट में यह कहा गया है कि विश्वविद्यालय के एक काश्मीरी छात्र उमर खालिद ने विश्वविद्यालय परिसर में 10 अलगाववादी काश्मीरी युवकों को लेकर आया और उसने वहां फांसी दिये जा चुके काश्मीरी आतंकी अफजल गुरु की सजा उसकी शहादत बताते हुए भारत को टुकड़े-टुकड़े कर देने के नारे लगाये. अन्य छात्रों के प्रतिकार करने पर यह मामला सामने आया है और बवाल उठ खड़ा हुआ है.

इसमें छात्र संघ का अध्यक्ष कन्हैया की लिप्तता के बारे में दिल्ली के पुलिस कमिश्नर श्री बस्सी का कहना कि उसके खिलाफ भारत द्रोही गतिविधि करने के पर्याप्त पर सबूत है. उसे अदालत में पेश किया जा चुका है और मुकदमा चलेगा. जाहिर है श्री बस्ती खुद ही है तो उसके बारे में फैसला करेंगे नहीं, वह तो अदालत ही करेगी. इस पूरे प्रकरण पर पुलिस की सघनता से जांच चल रही है.

बीच में राजनैतिक हस्तक्षेप करने वालों को झिड़कते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भी यह कहा है कि वह नेता वही है कि हर मामले में कूद जाए. लोगों को पुलिस की जांच पर भरोसा रखना चाहिए. इस मामले में विश्व विद्यालय के भूतपूर्व काश्मीरी प्रोफेसर ए.आर. गिलानी को भी राष्टï्रद्रोह के अपराध में गिरफ्तार किया गया है. गिलानी और कन्हैया दोनों को अदालत ने पुलिस रिमांड पर आगे की जांच के लिए भेज दिया है. कश्मीर घाटी के मुस्लिम छात्र घाटी में चल रहे भारत द्रोही वातावरण में देशद्रोही कार्यवाही में लिप्त रहते हैं.

दिल्ली कांड का उमर खालिद और उसके साथ के 10 अन्य कश्मीरी फरार हो गये हैं. प्रोफेसर गिलानी ने तो दिल्ली प्रेस क्लब में भी भारत विरोधी नारे लगाये. मामला पटियाला हाऊस अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है. पुलिस जांच कर रही है. ऐसे में इस कांड पर राजनैतिक दृष्टिïकोण से उसे मुद्दा बनाना निश्चित तौर पर
अनुचित है.

इन दिनों की राजनीति व सार्वजनिक क्षेत्रों में हर किसी के बोलने पर कोई न कोई हंगामा खड़ा हो जाता है. ऐसे हर मामले में बयान देने या बोलने वाला नेता अपनी बात से मुकर कर यह कहता है कि उसने ऐसा कहा ही नहीं उनकी बात को तोड़-मरोड़ कर पेश किया है. दूसरी ओर उस पर धावा बोलने वाले उसे ‘माफीÓ मांगने को कहने लगते हैं. अभिव्यक्ति पर हमला केवल सरकार की तरफ से नहीं बल्कि हर तरह से हर कोई करने लगा है. कानपुर के एक पार्क में किसी ने बाबा साहब अम्बेडकर की मूर्ति को खराब कर दिया, उसकी प्रतिक्रिया मुम्बई-दादर में तोड़-फोड़ कर विरोध प्रगट किया गया.

सार्वजनिक स्थानों पर हर किसी बात पर रास्ता रोको, चक्का जाम, आगजनी, दुकानों को बंद कराने को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं कहा जाए. जाट अपने आंदोलनों में रेलवे पटरियों पर धरना देकर देश भर का रेल यातायात बाधित कर देते हैं. इन दिनों भी हरियाणा में जाटों ने फिर रेल पटरियों को धरने से ब्लाक कर दिया.

भीड़तंत्र और प्रजातंत्र दोनों एक दूसरे के विपरीत हैं. भीड़तंत्र से प्रजातंत्र ही नष्टï हो जायेगा. भारत में हिंसक तोडफ़ोड़ व आगजनी के आए दिन के प्रदर्शन यह खतरे की ओर संकेत दे रहे हैं कि भारत प्रजातंत्र से हटकर भीड़तंत्र हो रहा है.

Related Posts: