राष्टï्रपति श्री प्रणव मुखर्जी ने कहा कि न्यायपालिका की जल्द और सस्ती न्याय की चाहत को पूरा करना अभी बाकी है. उसकी यह जिम्मेवारी है कि सभी को न्याय सुलभ हो सके और कोई भी व्यक्ति आर्थित या अक्षमता के कारण न्याय से वंचित न रह जाए.

इलाहाबाद हाईकोर्ट की 150वीं वर्षगांठ के इसी अवसर पर भारत के प्रधान न्यायधीश श्री टी.एस. ठाकुर ने यह माना कि देश की न्यायपालिका विश्वसनीयता का संकट झेल रही है. हमें भीतर से ही चुनौतियां मिल रही है. लंबित मुकदमों का अंबार बढ़ता जा रहा है. जज अतिरिक्त घंटों में बैठने को तैयार है. लेकिन बार.. ( वकील) इसमें सहयोग नहीं कर रहे है.

सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट में हमेशा कुछ पद खाली पड़े रहते हैं. जबकि शासकीय प्रक्रिया में जिस दिन किसी जज की नियुक्ति होती है उसी समय यह पता रहता है कि वह किस दिन रिटायर होंगे. इसमें वर्षों का समय मिल जाता है. जिस दिन वह रिटायर हो उसी दिन दूसरा जज उस स्थान पर आ जाए. सरकार की बड़ी नौकरियों में यही होता है. बड़ी सरकारी नौकरियों में भी यही होता है पद खाली नहीं रखे जाते.

कुछ ही वर्षों पूर्व ब्रिटेन में लन्दन में नस्लभेदी दंगे हुए. बड़े पैमाने पर आगजनी और लूट की घटनायें उसी तरह हुई जैसी कि हाल ही में जाट आरक्षण के दंगे हरियाणा के रोहतक व अन्य जगह हुए थे. लंदन में सारी रात अदालतें खुली रहीं. पुलिस ने श्वेत (गोरे) दंगाईयों को पकड़कर अदालत में पेश किया और उसी रात उन्हें अदालतों में सजा भी दे दी. हरियाणा और रोहतक में यह क्यों नहीं हो सकता है. पूरा रोहतक लुटता जलता रहा, कोई शासन व पुलिस की ओर से न कोई दंगाई पकड़े गये. हर जगह यही होता है जांच हो रही है, नुकसान का आंकलन हो रहा है. यही दलीलें कुछ दिनों चलती रहती हैं और कुछ दिन बाद मामला ठंडा और भूला बिसरा हो जाता है.

कुछ अदालती फैसले भी उलझाने वाले हो जाते हैं. कई वर्षों पूर्व दो जघन्य अपराधी रंगा और बिल्ला ने दो बच्चों- एक लड़की-एक लड़का गीता व संजय चोपड़ा को कार में लिफ्ट देकर अपहरण कर लिया. दुष्कर्म करके दोनों की हत्या कर दी. कोई चश्मदीद गवाह नहीं था लेकिन परिस्थितियां उन्हें अपराधी कर रही थीं और उसी आधार पर उन्हें फांसी दे दी गयी. लेकिन हाल ही में भोपाल में मुस्तफा नाम के एक अपराधी ने अपने ही दोस्त की बच्ची को कहीं ले जाकर दुष्कर्म किया और हत्या कर दी. परिस्थितियां बता रही हैं कि वह उसे उसके भाई से अलग करके ले गया था. उसी ने यह बताया कि लाश कहां है और वहीं बरामद भी हुई. उसे निचली अदालत ने फांसी की सजा दे दी और हाईकोर्ट ने इस आधार पर उसे बरी कर दिया कि कोई चश्मदीद गवाह नहीं है.

फैसलों पर उंगली नहीं उठना चाहिए. हर मामला अलग होता है लेकिन सजा में कोई मान्य आधार भी तय होने चाहिए. हर अपराध में चश्मदीद गवाह हो ही नहीं सकता बल्कि ज्यादातर में होता भी नहीं है.

मीडिया ट्रायल की बात भी उठती रहती है लेकिन इस वास्तविकता से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि कई जघन्य मामलों में फिर से ट्रायल हुई है और बरी हो गये व्यक्ति को सजा हुई. जन सुरक्षा में मीडिया बहुत ही जागरूक और सक्षम भूमिका निभा रहा है.

दिल्ली के जिस रेस्ट्रां में जेसिका लाल को गोली मारी गयी कहा गया कि उस समय वहां एक पुलिस उच्च अधिकारी श्री कंठ भी थे लेकिन उस केस में कोई गवाह सामने नहीं आया. प्रियदर्शनी मट्टïू बलात्कार व हत्याकांड उच्च पुलिस अधिकारी का दोषी बेटा बरी हो गया. मीडिया की जागरूकता से ही फिर से ट्रायल और सजा हुई है.

चश्मदीद और गवाह पर ही अड़े रहने से ज्यादातर मामलों में अपराधी को सजा हो ही नहीं सकती. लोग पुलिस व अदालती झंझटों से गवाही देने नहीं आते.

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