मोदी सरकार को बड़ा झटका लगा है कि सुप्रीम कोर्ट ने उसके राष्टï्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम को असंवैधानिक घोषित कर दिया. इसके साथ ही अभी तक चला आ रहा जजों की नियुक्ति के लिये कालेजियम सिस्टम बहाल कर दिया. संविधान में यह व्यवस्था है कि राष्टï्रपति भारत के मुख्य न्यायाधीश और आवश्यक महसूस करने पर अन्य जजों से भी सलाह मशविरा करके जजों की नियुक्ति करेंगे. यह व्यवस्था 1998 में स्थापित की गयी थी और ठीक काम कर रही थी. प्रधानमंत्री श्री मोदी की वर्तमान सरकार ने इसकी जगह एक न्यायिक आयोग की व्यवस्था का कानून बना दिया.

जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश व 2 वरिष्ठï न्यायाधीश के अलावा केंद्रीय विधि मंत्री और दो नागरिक रहेंगे. अब यह नया ऐक्ट असंवैधानिक हो गया है. इसमें आगे चलकर सरकार या तो सुप्रीम कोर्ट में ही पुनर्विचार की याचिका लगाये या संवैधानिक प्रावधानों का परिपालन करते हुए कोई दूसरा विधेयक इस रद्द हो चुके अधिनियम के स्थान पर लाये.

यह भी एक सचाई है कि कुछ लोग हाईकोर्ट जज बनने के लिये राजनेताओं की आमद-खुशामद का रास्ता भी अख्तयार करते थे. कांग्रेस के प्रवक्ता श्री अभिषेक सिंघवी के ही कार ड्राइवर ने उनका ही एक स्टिंग आपरेशन कर डाला. जिसमें कार में उनसें एक महिला एडवोकेट यह कह रही है कि ‘हाईकोर्ट जज कब बनवाओगे.Ó इस वीडियो के वायरल होते ही उन्हें पार्टी के प्रवक्ता के पद से हटाया. इस मामले में दोनों के आपसी रिश्ते में भी नतीजे निकाले गये. किसी एडवोकेट में जज बनने की इच्छा होना स्वाभाविक है, लेकिन जजों की नियुक्ति में हर हालत में मेरिट और योग्यता होनी ही चाहिये. बड़ी अदालतों के फैसले के बड़े राष्ट्रव्यापी प्रभाव होते हैं.

यह भी एक यथार्थ है कि अदालतों में सबसे बड़ी मुकदमाबाज पार्टी सरकार ही होती है. कई बार जनहित याचिका में अदालतों को ऐसे आदेश देने पड़े कि जो काम सरकार को स्वयं करना ही चाहिए था. महीनों गुर्जरों ने रेल यातायात ठप्प रखा और अदालतों को सरकार को कहना पड़ा कि रेल ट्रेक से कब्जा हटाओ और रेल बहाल करो. मुम्बई हाईकोर्ट ने ‘मुंबई बन्दÓ आयोजित करने के लिये जिससे जनता को तकलीफ होती है. दो राजनैतिक दलों भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना पर 20-20 लाख रुपयों का जुर्माना लगाया. राजनैतिक दलों से प्रभावित लोग यदि जज बने तो वे ऐसे बोल्ड फैसले नहीं दे सकेंगे.
व्यापम और डी.मेट जैसे परीक्षाएं कराना सरकार का काम है और इन दिनों कोर्ट अपने आदेशों से करा रही है.

ब्रिटिश राज में अदालतें सरकार का ही अंग होती थीं, लेकिन संविधान निर्माताओं ने यह ही सही माना कि कार्यपालिका (एक्जीक्यूटिव) और न्यायपालिका (जुडीशरी) संवैधानिक सहयोगी होते हुए भी अपने-अपने पृथक अस्तित्व में रहे. संविधान के डायरेक्टिव प्रिंसीपल में यह निर्देश है कि देश में समान नागरिक संहिता बनायी जाए और हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट सरकार को लगातार आदेश देते जा रहे हैं कि इस डायरेक्टिव प्रिंसीपल का पालन करें.

स्वतंत्र न्यायपालिका ही संविधान की मर्यादा और आम जनता के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा की गारन्टी है. मोदी सरकार को संवैधानिक मर्यादा में रहकर काम करना उनके लिये और देश के लिये अच्छा रहेगा.

Related Posts: