High Court जबलपुर,  मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने आज एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए सरकारी विभागों में पदोन्नति में आरक्षण को अवैध घोषित किया है। न्यायालय ने अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग को पदोन्नति में आरक्षण देने के संबंध में वर्ष 2002 में बनाए गए नियम को असंवैधानिक ठहराते हुए निरस्त कर दिया है। इस फैसले से प्रदेश में 2002 से अब तक हुई लगभग 60 हजार पदोन्नतियां रद्द हो जाएंगी।

मुख्य न्यायाधीश ए एम खानविलकर और न्यायाधीश संजय यादव की युगलपीठ ने यह फैसला सुनाया। युगलपीठ ने कहा कि यह नियम भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16 और 335 के साथ-साथ उच्चतम न्यायालय द्वारा एम नागराज के मामले में दिए गए दिशा निर्देश के खिलाफ है। उन्होंने मध्यप्रदेश लोक सेवा पदोन्नति नियम 2002 के इससे संबंधित प्रावधान को खारिज कर दिया। यह नियम सरकारी विभागों के सभी पदों के लिए अनुसूचित जाति-जनजाति के कर्मचारियों की पदोन्नति के संबंध में था।

फैसले में इस नियम के तहत की गई पदोन्नतियों को भी उच्च न्यायालय ने अवैधानिक करार दिया है। इससे इस नियम के अंतर्गत की गई पदोन्नतियां गैरकानूनी हो गई हैं और उसका लाभ लेने वालों को पदावनत किया जाएगा। विभिन्न विभागों में ग्रेडेशन सूची 2002 के पूर्व की स्थिति में दोबारा बनाई जाएगी।

पदोन्नति में आरक्षण को लेकर भोपाल निवासी आर बी राय सहित 20 लोगों ने याचिकाएं दायर की थीं। इसमें मुख्य रूप से इस नियम को चुनौती दी गई थी। याचिकाओं में कहा गया था कि इस बारे में उच्चतम न्यायालय की गाइडलाइन का पालन नहीं किया गया है। पदोन्नति में आरक्षण दिये जाने से अन्य वर्ग के लोगों की पदोन्नति का हक मारा जा रहा है। मामलों में सरकार द्वारा अजा-जजा वर्ग को दिए गए आरक्षण को कटघरे में रखते हुए कहा गया कि इसमें वर्ष 2006 में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए दिशा निर्देशों का पालन नहीं किया गया, जिसके कारण पूरे प्रदेश में अजा-जजा वर्ग की हुईं करीब 60 हजार पदोन्नतियां अवैधानिक हैं और खारिज होने योग्य हैं। याचिका में यह भी कहा गया था कि पदोन्नति में आरक्षण देना संविधान की धारा 14 और 335 का उल्लंघन है।

अजाक्स की ओर से सरकार द्वारा दी गई पदोन्नति को वैध ठहराते हुए कहा गया कि सरकार ने यह कदम वर्ष 2002 में बने नियमों के तहत उठाया, जबकि उच्चतम न्यायालय का आदेश वर्ष 2006 में आया है। मामले में राज्य सरकार के नगरीय प्रशासन विभाग, जल संसाधन विभाग, ऊर्जा विभाग, लोक निर्माण विभाग और पशु चिकित्सा विभाग के प्रमुख सचिवों सहित अन्य को पक्षकार बनाया गया था।

याचिकाओं पर 29 मार्च से 31 मार्च तक लगातार तीन दिन तक बहस हुई और 31 मार्च को न्यायालय ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। 35 पृष्ठीय आदेश आज सार्वजनिक कर दिया गया।

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