सुप्रीम कोर्ट ने अखिल भारतीय मेडीकल परीक्षा के जरिये देश भर में परीक्षाओं के बिगड़े माहौल को सुधारने के बड़े प्रयत्न किये और उनका सुखद परिणाम भी सामने आने लगा है. इम्तहान कराना राज्य सरकारों के शिक्षा विभाग और शिक्षण संस्थाओं का काम है, जो अंग्रेजों के जमाने से वर्तमान शिक्षा प्रणाली में अभी कुछ दशकों पूर्व तक विभागीय स्तर पर ही होता आया है. कही पुलिस की जरूरत नहीं होती है. स्टाफ ही परीक्षाओं का सुचारू संचालन करते रहे. चुने गये शिक्षकों के पास परीक्षाओं के उत्तरपुस्तिका जांचने के लिये भेजी जाती थीं. लेकिन धीरे-धीरे यह व्यवस्था इतनी बिगड़ी कि परीक्षा में नकल बढ़ती गयी. निगरानी शिक्षक ही नकल कराने लगे, जो लोग स्कूल चलाते है उन्होंने नकल को ही अपना गारंटी व्यवसाय बनाया है. मामला बिगड़ते-बिगड़ते यहां तक आ गया कि मध्यप्रदेश में व्यापमं घोटाला तक हो गया है. जिससे उच्च शिक्षा मंत्री रहे श्री लक्ष्मीकांत शर्मा व व्यापमं बोर्ड के उच्च अधिकारी जेलों में है और सी.बी.आई. स्तर की जांच हो रही है.

इसी क्रम में मेडीकल की परीक्षाएं अब राज्य स्तर पर न होकर केंद्रीय स्तर हो रही है. इसमें भी रोहतक (हरियाणा) में भारी धांधली पकड़ी गयी और सुप्रीम कोर्ट ने पूरे देश की अखिल भारतीय प्री-मेडीकल टेस्ट परीक्षा रद्द कर और बोर्ड को आदेश दिया कि वह नये सिरे पर उसकी गाइड लाइन के अनुसार परीक्षा कराये. इसी के परिपालन में सेन्ट्रल बोर्ड ने नकल की संभावनाएं पूरी तौर पर खत्म करने और परीक्षा बिलकुल साफ-सुथरी हो इसके लिये कुछ नियम बनाये, जिनका कड़ाई से पालन किया जाकर परीक्षाएं हो रही हैं. इसमें भी अड़ंगेबाजी के लिये कुछ लोगों ने टोपी, बुरका-स्कार्फ पहनने के लिए धार्मिक मुद्दे उठा दिये. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ उन्हें रद्द किया बल्कि ऐसा निर्णय दिया कि आगे भी लोग ऐसे मुद्दे न बना पायेंगे. एक इस्लामी संगठन ने बुर्का व टोपी पहनने को धार्मिक अधिकार के रूप में उठाया. सुप्रीम कोर्ट ने बोर्ड के नियमों को सही बताते हुए इस्लामी संगठन को भी लताड़ लगाते हुए कहा कि एक दिन इनके न पहनने से उनकी धार्मिक आस्था खत्म नहीं हो जायेगी. इसी तरह केरल में भी एक नर्स को स्कार्फ न उतारने की वजह से परीक्षा में ही नहीं बैठने दिया.
कोर्ट के निर्देशानुसार इस परीक्षा के नियमों को देश की सभी बोर्ड व विश्वविद्यालयों में लागू कर परीक्षाओं में विश्वास व वास्तविकता को लाना जरूरी हो गया है अन्यथा भारत के सर्टीफिकेट व डिग्रियों पर देश व दुनिया में कोई विश्वास नहीं करेगा.

यह प्रशासन की हद दर्जे की गिरावट है कि परीक्षायें भी राज्य से हटाकर केन्द्र सरकार और उसके भी ऊपर जाकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश में करायी जायें. जांचें भी राज्य पुलिस की एस.टी.एफ. के हाथों से निकल कर सी.बी.आई. और कोर्ट के निर्देशन में भेजी जा रही हैं.

मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ में एक मंत्री ही उसकी शिक्षण संस्थाओं को पूरे तौर पर नकल के आधार पर चलाता था. बिहार में खुलेआम परीक्षा हॉलों की खिड़कियों से नकल पहुंचाने वालों की भीड़ खुलेआम मौजूद टेलीविजन पर दिखाई गयी.
शिक्षण संस्थाएं, परीक्षा लेने वाले बोर्ड, दलाल और राजनेता तक इसमें लिप्त हैं. परीक्षा का पूरा खेल ही ‘फिक्सिंगÓ हो गया है. शासन-प्रशासन असफल हो गया है. अब विभागीय और शासकीय कार्य कोर्ट के मार्फत होने लगे हैं.

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