विभाजन के बाद से ही भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में उतार-चढ़ाव के दौर आते रहे हैं, इन छह दशकों में दोनों देशों के बीच तीन युद्ध होने के बाद समय-समय पर वार्ताओं के दौर भी चले. कभी जिया उल हक ने क्रिकेट डिप्लोमेसी चलाई तो कभी अटलजी लाहौर बस लेकर पाक पहुंचे, इसके तुरंत बाद कारगिल युद्ध एवं 26/11 के मुंबई हमले ने दोनों देशों के रिश्तों को नाजुक दौर में पहुंचा दिया. पाक एम्बेसी में पाकिस्तान दिवस के सेलीब्रेशन में कश्मीरी अलगाववादियों को न्यौतने का विवाद अभी ठंडा भी नहीं हुआ है कि भारत के कड़े विरोध के बावजूद मुंबई आतंकवादी हमले के मास्टरमाइंड जकीउर रहमान लखवी की अडियाला जेल से रिहाई ने दोनों देशों के संबंधों में एक बार फिर से खटास पैदा कर दी है.

जाहिर है कि पाक से अच्छे रिश्तों की उम्मीद लगाए भारत के लिए यह अत्यंत निराशाजनक एवं दुर्भाग्यपूर्ण है. लखवी को पाकिस्तानी आतंकवादी संगठन लश्करे तैयबा से जुड़ा माना जाता रहा है और कई जांच एजेंसियों की अभी तक की पड़ताल में यह बात पुख्ता तौर पर साबित हो गई है कि लश्करे तैयबा ही भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई में 2008 में हुए आतंकवादी हमले के लिए जिम्मेदार है. इस हमले में 166 लोग मारे गए थे और इस दिल दहला देने वाली घटना ने न सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया था. जाहिर है कि लखवी की रिहाई आतंकवाद के खिलाफ जीरो टोलरेंस के अनुरूप नहीं है.

भारत आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में ‘कतई बर्दाश्त नहींÓ की नीति अपनाता है और हमारी सरकार ने पाकिस्तान के हुक्मरानों को इस संबंध में कई बार अवगत भी करा दिया था, इसके बावजूद हमारे पड़ोसी राष्ट्र ने भारत के कड़े विरोध और अंतर्राष्ट्रीय दवाब को दरकिनार करते हुए लखवी को जेल से रिहा कर दिया.

पाक शुरू से ही लखवी के प्रति नरम रूख अपनाता रहा है, लाहौर हाईकोर्ट की इस टिप्पणी से यह बात जाहिर भी होती है कि पाक शासित पंजाब सरकार लखवी को हिरासत में रखने की जरूरत पर अदालत में कोई पुख्ता सबूत पेश नहीं कर सकी, अर्थात वहां की सरकार ने ही लखवी के केस को काफी कमजोर कर दिया था, उसके संबंध में भारत सरकार ने जो सबूत पेश किए थे, वे भी ताक पर रख
दिए गए.
मुंबई हमले के बाद पाक सरकार की ढिलाई के चलते लखवी कोई पहली मर्तबा जेल से रिहा नहीं हुआ है, इससे पहले मुंबई हमले की सुनवाई कर रही लाहौर की स्थानीय अदालत ने भी लखवी की रिहाई का आदेश दिया था लेकिन उस वक्त अंतर्राष्ट्रीय दवाब के कारण मजबूर होकर पाक सरकार ने लखवी को जेल में ही रखने का आदेश दिया था, उस वक्त भारत को उम्मीद बंधी थी कि लखवी के मामले में पाक सरकार वाकई गंभीर है लेकिन दस-दस लाख के दो जमानती बांड भरने के बाद रात के अंधेरे में गुपचुप तरीके से अडियाला जेल से लखवी की रिहाई ने समूचे विश्व के समक्ष एक बार पुन: यह बात साबित कर दी है कि पाक सुधर नहीं सकता है और वह भारत को कड़ी कार्रवाई के लिए विवश कर रहा है.

यह सब तब हो रहा है जब पाक में इस समय एक लोकतांत्रिक सरकार सत्तासीन है और वहां के प्रधानमं़त्री मियां नवाज शरीफ आतंकवाद के खिलाफ आखिरी सांस तक लड़ाई की सौगंध खाते नहीं थकते. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पदारूढ़ होने के बाद पाक से रिश्ते सुधारने की हरसंभव कोशिश की है, मोदी ने अपने शपथग्रहण समारोह में नवाज शरीफ को आमंत्रण देकर यही संदेश देने की कोशिश की थी कि भारत अपने सबसे महत्वपूर्ण पड़ौसी देश के साथ दोस्ताना रिश्तों के नए अध्याय की शुरूआत करना चाहता है, लेकिन कुछ माह पहले जिस तरह सीमा पर सीज फायर का पाक की ओर से लगातार उल्लंघन हुआ और कश्मीर में पीडीपी-भाजपा की गठबंधन सरकार बनने के बाद श्रीनगर, बारामूला आदि इलाकों में आतंकी हमलों की घटनाएं हुईं, उससे यही संदेश गया है कि पाक द्वारा भारत को अपने खिलाफ कठोर कार्रवाई के लिए मजबूर किया जा रहा है. पंचशील के सिद्धांतों में यकीन रखने वाले भारत ने किसी देश पर आक्रमण न करने की नीति अपना रखी है लेकिन पाक का यही रवैया बरकरार रहा तो भारत को भविष्य के लिए अन्य विकल्पों को भी खुला
रखना होगा.

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