दिल्ली में भारत सरकार के पेट्रोलियम मंत्रालय में कई निम्नश्रेणी के कर्मचारियों और भूतपूर्व कर्मचारियों द्वारा दस्तावेजों की चोरी और फोटोकापी जासूसी पकड़ में आयी है.

वास्तविकता में यह भी उजागर हो गया है कि ये लोग स्वयं जासूस नहीं थे बल्कि चोरी के तौर-तरीकों से दूसरे वास्तविक जासूसों के लिये जासूसी का काम बतौर नौकरी धंधा के रूप में करते हैं. इसके लिये उन्हें उन लोगों से इस काम के लिये रुपया मिलता था. ये किराये के जासूस थे और वास्तविक जासूस देश की बड़ी कारपोरेट कंपनियां रिलायन्स, इस्सार, केयन्र्स, जुबिलियेंट इनर्जी के 5 उच्च अधिकारी भी पकड़े गये है. जाहिर है ये अधिकारी भी अपने मालिकों के लिये और जासूसी से उठायी गई सूचनाएं उन्हें ही पहुंचाते होंगे. लेकिन अब मामला और भी गहरा गया है कि मंत्रालय के दो संयुक्त सचिव भी लिप्त होने के दायरे में आ चुके है. निम्न वर्ग के लोग चोरी से रुपया सामान- माल उड़ाते है. डाक्युमेंट की जासूसी और चोरी तो उच्च राष्टï्रीय या अंतरराष्टï्रीय स्तरों पर करायी जाती है. पता यह चल रहा है कि ऐसी जासूसी केंद्र सरकार के 18 मंत्रालयों में भी होने के सुराग मिले है. यह भी आंकलन हो रहा है कि सरकारी गोपनीय डाक्युमेंटों की चासूसी-चोरी पिछले कई वर्षों से होती ही चली आ रही है और ये ‘हाई प्रोफाइलÓ काले धन की तरह काला धंधा है. भारतीय नौसेना में भी ‘वार रूमÓ जासूसी में ऐसा व्यक्ति पकड़ा गया था जो नौसेना प्रमुख का करीबी रिश्तेदार था और भंडाफोड़ होते ही विदेश भाग गया था.

जब श्री राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे तब भी प्रधानमंत्री कार्यालय (पी.एम.ओ.) के छोटे कर्मचारी नियमित रूप से निरन्तर और सामान्य रूप से दस्तावेज व फाइलें एक शंकरनारायनन व्यक्ति को दिया करते थे जो उनमें उसके मतलब के महत्वपूर्ण दस्तावेजों की जानकारी उससे संबंधित व्यक्तियों या कम्पनियों को बेचता रहता था. इसमें कोई ‘खासÓ डाक्युमेंट की जासूसी लक्ष्य नहीं होता है- सामान्य तौर पर जो भी जानकारी हाथ लग जाए जिसे ‘केश’ किया जा सकता है. इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी के प्रिंसिपल सेक्रेटरी श्री पी.सी. अलेक्जेन्डर को इस्तीफा देना पड़ा था. इस जासूसी टाइप राइटर से उतारे गये कार्बन पेपर तक उसे पहुंचाये जाते थे.
कुछ महीनों पूर्व पेट्रोलियम मंत्रालय के कुछ अधिकारियों को फोटोकापी मशीन में जोड़ी गई कुछ फोटो कापी को देखकर शंका हुए थी. मामला आगे बढ़ाकर इन्टेलीजेन्स ब्यूरो को सौंपा गया और एक बड़े पैमाने पर निरन्तरता में लगभग सभी केन्द्रीय मंत्रालयों में चली आ रही जासूसी पकड़ आयी है- लेकिन जिसे ‘पर्दाफाशÓ होना कहते हैं वह अभी बाकी है. कारपोरेट अफसरों, चेनल व वेबसाइट चलाने वाले की पकड़ से परत-दर-परत खुलना शुरू हो गई है. लेकिन लोगों के लिये कानूनों में कुछ वर्षों की सजा का प्रावधान रहता है. इन लोगों को जब तक वे जीवित हैं- जेल में ही रखा जाना चाहिए.

प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के जमाने में उनके दफ्तर के रद्दी की डलिया में डाले गये व अन्य सभी पेपर एक ‘शुरुडिगÓ मशीन में डाले जाते थे जो उन्हें बिल्कुल बारीक न पढ़ा जाने वाला कचरा बना देती थी और तब उसे फेंका जाता था. इसे देखते हुए यह भी लगता है कि जब रद्दी तक पर इतनी चौकसी रखी जाती थी तो उस समय फाइलों को भी कड़ी सुरक्षा व हिफाजत में रखा जाता होगा. एक समय केन्द्रीय सूचना मंत्रालय के उच्च पी.आई.बी. अफसर भी एक राजदूत को खुफिया दस्तावेज देते हुए पकड़ा गया. अब जो कुछ सामने आ रहा है कि भ्रष्टाचार अनेकों रूपों में काम कर रहा है. अब बात केवल रिश्वत लेने-देने तक सीमित नहीं हैं बल्कि सरकारी अफसरों व नेताओं तक की खरीदी जासूसी जैसे राष्ट्रव्यापी कामों में हो रही है.

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