पेट्रो क्रूड की कीमतें रिकार्ड गिरावट में आकर 40 डालर प्रति बैरल से नीचे 36.05 प्रति डालर पर आ गयी है. भाव गिरने से नतीजा तो यही निकलना चाहिए था कि उपभोक्ताओं के लिये पेट्रोल व डीजल सस्ते हो जाते. सस्ते डीजल की वजह से माल ढुलाई के रेट कम हो जाते सभी वस्तुओं के भाव भी घटते. लेकिन यह इसलिए नहीं हो सकता है कि क्योंकि केंद्र व मध्यप्रदेश सरकार और संभवत: अन्य सभी राज्य सरकारें जनता के प्रति ईमानदार नहीं है. हर टैक्स का एक रेट होता है जो वस्तु के मूल्य के आधार पर ऊपर-नीचे होता है.

वेट का नाम ही इसी सिद्धांत पर बना है- वेल्यू एडिट टैक्स- मूल्य आधारित कराधान, लेकिन हो यह रहा है कि जब भी पेट्रो क्रूड के भाव बढऩे से पेट्रोलियम पदार्थों के मूल्य बढ़े तब केंद्र ने एक्साइज ड्यूटी और मध्यप्रदेश सरकार ने वेट को भी उसी अनुपात में बढऩे दिया. लेकिन जब पेट्रो क्रूड के भाव गिरते हैं तो यही सरकार एक्साइज व वेट के रेट बढ़ाकर उस घटने को अप्रभावी करते है. क्योंकि टैक्स घटने से केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी और मध्यप्रदेश सरकार की वेट से आमदनी कम हो जाती है. अभी हाल की गिरावट में सिर्फ एक महीने में पेट्रो क्रूड के भाव 18.5 प्रतिशत गिरे है.

केंद्र सरकार ने दूसरे ही दिन पेट्रोल पर 30 पैसे और डीजल पर 1.17 रुपये एक्साइज ड्यूटी बढ़ा दी और ऐसा वह 6 बार कर चुकी है. यही हाल मध्यप्रदेश का है कि हर बार वेट की दरें बढ़ाये हैं. मध्यप्रदेश सरकार का अब यह नैतिक दायित्व बनता है कि टैक्स प्रणाली तो जारी रहेगी ही, लेकिन उसमें ‘वेटÓ शब्द हटा दिया जाए- क्योंकि सरकार ने स्वयं ही उसे मूल्य आधारित नहीं रहने दिया है. भाव घटने से जो फायदा आम जनता और व्यापार को होना चाहिए वह सरकार हड़पती जा रही है. पिछले 18 महीनों में पेट्रो क्रूड के भाव 59 प्रतिशत कम हुए हैं. लेकिन देश की जनता को यह कमी 16 से 20 प्रतिशत ही मिली.

सरकारों का ऐसा ही दोमुंही बातें या चरित्र शराब, तम्बाखू, गुटका आदि के बारे में भी है. संविधान के निर्देशात्मक सिद्धान्तों में कहा गया है कि स्टेट (राष्टï्र) नशाबन्दी लागू करेगा. लेकिन सरकार के बजट में शराब में सबसे बड़ी मद होती है. वे शराब बन्द नहीं करना चाहते. लेकिन प्रचार-प्रसार भाषणों में यही कहा जाता है- लोगों को नसीहत दी जाती है कि वे शराब न पिएं, तम्बाखू, गुटका ड्रग्स न लें- धूम्रपान न करें. लेकिन सरकारें आसवानी (डिस्टलरियां) चलाती हैं और निजी क्षेत्र को भी अनुमति है. तम्बाखू के गुटखा पर रोक है और वह सादा गुटखा के पाऊच में हर जगह उपलब्ध है.

शराब, गुटखा सिगरेट का उत्पादन ही बन्द कर देना चाहिए. इनसे सरकार को जितनी आमदनी होती है उससे कहीं ज्यादा नुकसान आम जनता को उसकी आमदनी व स्वास्थ्य में होता है. घरों में कलह और अपराधियों की संख्या बढ़ती जा रही है.

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