पेरिस में जलवायु समझौता दुनिया को विनाश से बचाने के लिये एक बहुत बड़ा कदम है. संयुक्त राष्टï्र के तत्वावधान में इस 196 राष्टï्रों के शिखर सम्मेलन ने बिना किसी विसंगति से सर्वसम्मति से 31 पृष्ठों की पेरिस घोषणा का समर्थन किया है. इस शिखर सम्मेलन में भारत, चीन और अमेरिका प्रमुख भूमिका में है. यह तय किया गया है कि सभी राष्टï्र मिलकर दुनिया के तापमान में आयी वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस नीचे लायेंगे.

दुनिया में सबसे ज्यादा उष्मता उस कार्बन उत्सर्जन से हो रही है जो थर्मल पावर प्लांट व अन्य उद्योगों में कोयला जलाने से होती है. यह भी संभव नहीं है कि कोयला ऊर्जा को एकदम से खत्म कर दिया जाए. अमेरिका में भी 38 प्रतिशत बिजली अभी भी थर्मल प्लांटों से मिलती है. भारत ने इसी संदर्भ में यह कहा है कि जिन विकसित देशों ने परमाणु ऊर्जा प्राप्त कर ली है उन सभी को फौरन थर्मल प्लांट व अन्य उद्योगों को कोयला जलाने काम बंद कर देना चाहिए.

इससे तात्कालिक रूप से विश्व में कार्बन उत्सर्जन में काफी कमी आ जायेगी. भारत जैसे देश जिनकी औद्योगिक गतिविधियां 80 प्रतिशत कोयला आधारित थर्मल बिजली है. वे उस समय तक कोयला का इस्तेमाल बंद कर ही नहीं सकते जब तक उनके पास दूसरी और कोई ऊर्जा न आ जाये. विकसित परमाणु ऊर्जा के राष्टï्रों का यह दायित्व है कि वे अन्य देशों में परमाणु ऊर्जा के प्लांट लगाने में संयंत्र व फंड प्रदान करें.

कार्बन उत्सर्जन और सारी दुनिया में विकास के साथ-साथ कारों, ट्रकों व अन्य वाहनों की संख्या बड़ी तेजी से बढ़ती जा रही है. इनसे निकलने वाली कार्बन मोनो आक्साइड गैसें भी न सिर्फ उष्मता में वृद्धि कर रही हैं बल्कि इन जहरीली गैसों से जीवन को भी खतरा पैदा हो गया है. जहां बड़े उद्योगों का धुआं ऊंची चिमनियों से वातावरण में काफी ऊपर निकलता है- वहीं सड़क के वाहनों से जहरीली गैसें सतह पर ही रहकर जीवन को संकट पैदा कर रही हैं.

पेट्रोल के बाद कई दशकों पहले डीजल भी सड़क वाहन का ईंधन बन चुका है और इसका प्रयोग तो पेट्रोल को काफी पीछे छोड़ते जा रहा है. हर बड़े वाहन- ट्रक, बस, रेलवे का डीजल इंजन भी डीजल आधारित हो गये हैं. अब डीजल उद्योग व व्यापार का ईंधन बन गया है. इस पर गौर कर लिया जाए कि हमारा देश कृषि प्रधान है. अब खेती में बैलों से जुताई लगभग तीन प्रतिशत बची है बाकी पूरी खेत जुताई टैक्टर से होती है, जो डीजल से ही चलते हैं.

दिल्ली सरकार डीजल वाहनों पर रोक लगा रही है. व्यवहारिकता में यह देखा जाए कि क्या ऐसा संभव है कि पूरे देश में डीजल को चलन से बाहर कर दिया जाए. अब पेट्रोल पर कारें और टू या थ्री व्हीलर वाहन ही बचे हैं. कारों में डीजल कारों का प्रतिशत बढ़ता और पेट्रोल वाहनों का प्रतिशत घटता जा रहा है. दिल्ली का डीजल वाहन विरोधी फैसला अव्यवहारिक व तुगलकी लगता है. समस्या का निराकरण ऐसे नहीं हो सकता कि कुछ भी करने लगें.

भारत हर दिन पूर्ण सूर्य का देश है. इसे विश्व में सौर ऊर्जा में सबसे आगे रहना चाहिए. देश में हर शोध संस्थान में सौर ऊर्जा के विकास व शोध पर फंड मुहैया कराया जाए. हमारे देश में कोयला का विपुल भंडार है जो 200 साल के लिए काफी है. हम उसे हमेशा के लिये पूरी तौर पर त्याग नहीं सकते. इस पर शोध होना चाहिए जैसे ट्रीटमेंड प्लान्ट से गंदे पानी का दुष्प्रभाव खत्म किया जाता है, उसी तरह ऐसी विधि खोजी जाए कि कार्बन उत्सर्जन को भी खत्म किया जाए. प्रकृति ने यह बनाकर दी थी कि आक्सीजन मानव प्राणवायु है और वह सांस छोडऩे में कार्बन छोड़ता है और वृक्ष कार्बन लेते हैं और सांस से आक्सजीन छोड़ते हैं. संसार भर में वनों का विनाश करके मानव जाति ने अपना ही विनाश कर लिया. सौर ऊर्जा और सघन वनों से समस्या निदान निहित है.

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