वित्त वर्ष 2017-18 के पहले 9 महीनों अप्रैल से दिसंबर तक प्रत्यक्ष कर 18.2 प्रतिशित बढ़ा. यह अर्थव्यवस्था की सही दिशा है. क्योंकि प्रत्यक्ष कर उन्हीं लोगों पर लगता है जिन पर निश्चित और निर्धारित किया गया है, जबकि सामान्य कर सभी पर एक सा लगता है.

जिसका भार निम्न आय वर्ग के लोगों पर पड़ता है. कर निर्धारण का मान्य सिद्धांत यह है कि कराधान उन लोगों पर ही लगे जिनकी कर देने में आर्थिक क्षमता उन्नत हो और वे लोग बचे रहे जो मध्य व निर्धन वर्ग के लोग होते हैं. यह सिद्धांत केवल प्रत्यक्ष कराधान में ही होता है. इस समय देश में प्रत्यक्ष कर संग्रह में काफी वृद्धि से उसे सही दिशा में लाया गया है.

वित्त मंत्रालय ने जानकारी दी है कि प्रत्यक्ष करों में आय 18.2 प्रतिशत से बढ़कर 6.56 लाख करोड़ हो गयी है. प्रत्यक्ष करों में व्यक्तिगत आयकर, संपत्तिकर और कम्पनी कर शामिल हैं. बजट में यह अनुमान लगाया गया था कि इस वित्तवर्ष में 9.8 लाख करोड़ रुपये प्रत्यक्ष करों से मिलेंगे.

अभी तीन माह का समय मार्च तक बाकी है और पूरे आसार यही दिख रहे हैं कि ये बहुत कम बची रकम 2.62 लाख करोड़ भी प्राप्त होकर बजट अनुमानों के अनुसार हो जायेगी. इस वित्त वर्ष में अग्रिम कर वसूली में भी 12.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई. व्यक्तिगत आयकर में अग्रिम प्राप्ति में सर्वाधिक 21.6 प्रतिशत की वृद्धि रही. 1 फरवरी को केंद्र सरकार का नया बजट आने जा रहा है.

ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि आगामी बजट में आयकर से छूट की सीमा वर्ष 18-19 में वर्तमान ढाई लाख से बढ़ाकर तीन लाख कर सकती है. यह बजट मोदी सरकार का 5 वर्षीय काल का अंतिम बजट होगा. इसके बजट 2019 में लोकसभा के नये चुनाव होंगे. इसलिये इस बार के बजट पर आगामी चुनाव का प्रभाव परिलक्षित होगा और भारी कराधान या अप्रिय वित्तीय स्थिति नहीं होगी.

सरकार नई सोना नीति भी लाने वाली है. इसके तहत गोल्ड बोर्ड और गोल्ड स्पाट एक्सचेंज स्थापित किये जायेंगे. जी.एस.टी. से कर प्रणाली का काफी असर इस नये बजट में दिखेगा. हालांकि जी.एस.टी. को लगे अभी पूरा एक वर्ष नहीं हुआ है. नोट बंदी के बाद भी अभी उसकी बिगड़ी हालत में सुधार नहीं हुआ है.

इसकी मार अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों पर पड़ी है. इस दौरान बैंकिंग उद्योग की वृद्धि दर लगभग 12 प्रतिशत रही. विदेशी बैंकों की तरफ लोगों का रुझान काफी कम नजर आ रहा है. उनमेें लोगों का डिपाजिट में मात्र 1.4 प्रतिशत बढ़ा. देश में विदेशी बैंकों की संख्या भी घटती जा रही है. वर्ष 2015-16 में देश में विदेशी बैंकों की 325 शाखायें थीं जो अब घटकर 295 हो गयी हैं.

सरकार की वित्तीय नीति कई दिशा में रोजगार बढ़ाने की ओर है. सरकारी नौकरियों में अभी लगभग 7 लाख पद खाली पड़े हैं जिन पर नियुक्तियां नहीं की गयी हैं. इसका एकमात्र उद्देश्य वेतन बजट में कमी लाना है और सरकार इस समय भी इन पदों को भरने नहीं जा रही है. इस कमी का सबसे ज्यादा असर रेलों पर पड़ा है कि सबसे जरूरी ट्रेक मेन्टेनेन्स भी नहीं हो रहा है.

इसमें यह एक और बात दिखायी दी कि रेलवे के लगभग सभी अफसरों के घर रेलवे के निम्न श्रेणी के कर्मचारी उनके घरों का काम करते रहे. इसमें सरकार ने कड़ा रुख अपनाया है. बजट में रेलवे बजट भी शामिल किया जा चुका है और उम्मीद है कि नये बजट में रेलवे के रखरखाव के लिये काफी वित्तीय प्रावधान होगा.

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