मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने मध्यप्रदेश सरकार द्वारा सन् 2002 में सरकारी नौकरियों में आरक्षण के आधार पर जो प्रमोशन दिया जा रहा है, उसे रद्द कर दिया है. करीब 80 हजार प्रमोशन पाये शासकीय सेवकों पर असर पड़ेगा. लेकिन फिलहाल यह नहीं होने जा रहा है, क्योंकि राज्य सरकार इस निर्णय के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में अपील करने जा रही है. वहां भी एक आम प्रक्रिया के तहत संभवत: यह तय होगा कि सुप्रीम कोर्ट के अपीलीय निर्णय तक हाईकोर्ट का फैसला ‘स्टेÓ किया जाता है.
अब यह मामला राजनैतिक निर्णय न रहकर कानूनी हो गया है. संभवत: उत्तरप्रदेश में भी प्रमोशन में आरक्षण को माना नहीं गया है. बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती राज्यसभा में यह मांग कर चुकी है कि प्रमोशन में आरक्षण को संवैधानिक व्यवस्था की जाये.

मूल रूप से यह मसला सामाजिक उत्थान का है. शोषित वर्ग के मसीहा डॉक्टर अंबेडकर केवल दो वर्ग- दलित जो अछूत वर्ग के थे और जंगलों में सभ्यता… से दूर रहने वाले आदिवासियों के लिये मूल संविधान में ही यह व्यवस्था कराई थी कि इन दो वर्गों को आरक्षण का लाभ दिया जाएगा ताकि ये लोग जो बहुत पीछे चले गये हैं आगे आ सके. सब कुछ ठीक चल रहा था लेकिन 11 माह दूसरों के समर्थन से प्रधानमंत्री रहे श्री पी.वी. सिंह ने उनकी राजनैतिक कमजोरी में अन्य पिछड़े वर्गों को भी 27 प्रतिशत आरक्षण देकर, उनका मूलरूप ही समाप्त कर दिया. जाट, पाटीदार जैसे सम्पन्न किसान वर्ग में पिछड़े वर्ग में आने और आरक्षण पाने की होड़ लगी. सरकार को चुनौती देते हुए उग्र हिंसक आंदोलन हो गये. हर जाति ही यह तय करने लगी है कि वह पिछड़ा वर्ग है उसे कितने प्रतिशत आरक्षण दिया जाए.

ऐसे माहौल में मांग का असर नौकरियों में प्रमोशन तक आ गया और धर्म के आधार पर भी आरक्षण की मांग होने लगी. उसका नतीजा यह हुआ कि जिस समाज में जाति तोड़ो, छूआछूत छोड़ो, सामान्य नागरिक संहिता बनाओ की अभिव्यक्ति संविधान व्यक्त की गयी थी वह भी धराशायी हो गया. आज पूरा समाज जातियों में बंट गया. अब बात यहां तक आ गयी राजस्थान व गुजरात राज्य सरकारों ने आर्थिक आधार पर सवर्णों को भी आरक्षण दे दिया.

जहां ‘अतिÓ होती है, वहां विनाश हो ही जाता है. कहावत है ‘अति सर्वत्र वर्जित.Ó आरक्षण में अति हो गयी और आज आरक्षण ही खत्म हो गया. ‘मुश्किलÓ का अर्थ होता है जो ‘आसानÓ न हो- गालिब ने इसे अपने एक शेर में इस तरह परिभाषित कर दिया ‘मुश्किलें हद से बढ़ी- कि आंसा हो गयी.Ó मुश्किलों में अति हो जाए तो वे उसके विपरीत आंसा हो जाती हैं.

अब स्थिति यह है कि यदि सुप्रीम कोर्ट अपील में हाई कोर्ट का फैसला रद्द करता है तो प्रमोशन में आरक्षण जारी रहेगा. यदि ऐसा नहीं हुआ और हाई कोर्ट का फैसला कायम रखा तो यह राजनैतिक मुद्दा बनने जा रहा है कि कानून बनाकर जरूरी हो तो संविधान में संशोधन कर उसे प्रमोशन में भी आरक्षण को मान्य किया जाए. जाहिर है उस समय अन्य पिछड़ा वर्ग और जाट, मीणा, पाटीदार भी प्रमोशन में आरक्षण मांगेंगे. इस विनाशकारी प्रवृत्ति पर कहीं तो विराम लगाना ही होगा. यदि संभव हो तो यह किया जाए कि मूल संविधान में जिन वर्गों के लिए जिस तरह का आरक्षण किया गया था वहीं तक सीमित रखा जाए और इसमें बाद में जोड़े गये सभी निर्णय रद्द कर दिये जाएं.