मध्यप्रदेश सहित प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, राजस्थान, महाराष्टï्र, पश्चिम बंगाल, आंध्र, कर्नाटक आदि राज्यों में लगभग 60-70 लाख हेक्टेयर में मार्च की बेमौसम बरसात से खड़ी फसलें तबाह हो गयीं. खेत तालाब बन गये और खड़ी फसलें खेतों में बिछ गयी.

वर्षा के साथ-साथ तेज हवाओं व ओला वृष्टिï ने उन्हें सम्हलने लायक भी नहीं रखा. उत्तर भारत में वर्षा का क्रम जारी है और खेती के साथ मौसम भी बेहाल हो रहा है और लोगों को कर रहा है. मौसम खुलते ही गर्मी बढ़ जाती है और फिर बादल छाने, बरसने लगते है और मौसम ठंडा हो जाता है. यह लोगों के सामान्य स्वास्थ्य पर तो प्रतिकूल असर डाल ही रहा है साथ ही स्वाइन फ्लू फिर से बढऩे लगा है.

मार्च की बरसात में सबसे ज्यादा तबाही मध्यप्रदेश के जबलपुर संभाग व विन्ध्य क्षेत्र तथा हरियाणा में करनाल व अम्बाला, पंजाब में अमृतसर, उत्तरप्रदेश में कानपुर व बरेली और महाराष्टï्र में चंद्रपुर, यवतमाल व पुणे में भारी तबाही आयी है. केंद्र व राज्य सरकारों के पास ऐसी आपदाओं के लिये किसान फंड की व्यवस्था रहती है और उसे जारी किया जा सकता है.

किसान राहत में सबसे बड़ी बाधा प्रक्रिया और कार्यवाही होने में अत्याधिक विलम्ब सबसे बड़ी समस्या होता है. हर राज्य अपने यहां के खेती नुकसान को बढ़ाचढ़ाकर केन्द्र से फंड की मांग करता है. दूसरी ओर केन्द्र सरकार अपनी तरफ से मौका मुआइना के लिये अधिकारियों की टीमें भेजता है. इस सब प्रक्रिया में काफी समय लगता है. एक तो राज्यों को स्थिति के अनुकूल नुकसान का आंकलन कर उसे केन्द्र को बताना चाहिए. दूसरी ओर व्यवस्था में यह बात भी आ जाये कि केन्द्र सरकार राज्यों के आंकलनों को स्वीकार करे और जितनी जल्दी हो सके किसानों को फंड से राहत जारी कर दी जाए. इस बेमौसम बरसात ने कई जगहों पर खेतों को पूरी तरह नष्ट कर दिया है. वहां उत्पादन के नाम कुछ भी नहीं होने वाला. कई खेतों में फसल का दाना पतला पड़ जायेगा और उसका कोई मोल नहीं रहेगा. केवल पशु आहार के काम का रह जाता है.

प्रारंभ से एक लम्बे समय तक फसलों को ठंड से नष्ट करने वाले ‘पालाÓ को प्राकृतिक आपदा नहीं माना गया था. लगभग 4 वर्ष पूर्व मध्यप्रदेश में पाला से भारी तबाही हुई थी और उस समय मध्यप्रदेश शासन के तेज प्रयासों से ‘पालाÓ को भी प्राकृतिक आपदा माना गया.

इस समय यह स्थिति बनी हुई है कि किसानों को राहत से जुड़े अनुदान में केन्द्र सरकार में बरसात को प्राकृतिक आपदा नहीं माना गया है. लेकिन इस मार्च में बेमौसम बरसात से जो तबाही आयी है उसके कारण अब बरसात को भी इस जैसी परिस्थिति में शामिल करने का फैसला केन्द्र सरकार के स्तर पर कर लिया गया है.

इस बेमौसम बरसात से सब्जियों के दाम 67 प्रतिशत चढ़ गये. खेतों में पानी-कीचड़ हो जाने से सब्जियों की तुड़ाई और कटाई नहीं हो पा रही है. इसी वजह से उन्हें मंडियों बाजारों तक नहीं लाया जा रहा. आलू व प्याज की सप्लाई में कोई बाधा नहीं है. इनकी आपूर्ति बनी हुई है और दाम स्थिर चल रहे हैं.

Related Posts: