हमेशा से खेती भारत में सबसे बड़ा रोजगार धंधा रहा. देश को कृषि प्रधान और यह भी कहा गया कि भारत गांवों में बसता है. देश में जीवन बीमा के साथ सामान्य (जनरल) बीमा भी आया- लेकिन वह दुर्घटना, चोरी, आग जैसी आकस्मिक घटनाओं तक सीमित रहा. बीमा कम्पनियों ने कृषि को ऐसा जोखिम माना कि कभी उन्होंने कृषि बीमा के बारे में सोचा तक नहीं. स्वाधीनता के बाद में यदा-कदा कृषि फसल के बारे में चर्चा जरूर होती रही, लेकिन उसे उसकी विशालता के कारण ही बीमा व्यवसाय के लिए ठीक नहीं समझा. खेती का काम भी गरीबी और गांवों के बेपढ़े-लिखे लोगों तक सीमित रहा. जबकि अमेरिका व अन्य विकसित देशों में औद्योगिक युग में उसका मशीनीकरण हो गया और उसे उद्योग मानकर ज्वाइंट स्टाफ कम्पनियां उस काम को करने लगीं.

वहां मशीनीकरण के कारण हजारों एकड़ के बड़े-बड़े रेन्ज बनने लगे. उसी समय भारत की परिवार परम्परा में पीढ़ी दर पीढ़ी सम्पत्ति के बंटवारे में खेत भी बटतेे और आकार में छोटे होते गये. देश में सीमान्त किसानों की संख्या दिनों-दिन बढ़ती गयी और जोत छोटी से छोटी होती गयी. अधिकांश सीमान्त किसान खेती के मजदूर बन रहे गए. गांवों में बहुत ही कम संख्या के बड़े किसान होते थे जिनके पास बड़े-बड़े खेत होते थे. स्वतंत्र भारत में ‘भूमि सीलिंगÓ आने से बड़े खेत भी छोटे हो गये. खेती की दुर्दशा से अधिकांश छोटे किसान शहरों में छोटे काम-धंधों में मजदूरी में आ गये. गरीबी की दुर्दशा से गांवों से शहरों में पलायन और झुग्गी व गंदी बस्तियों को जन्म दिया.

खेतों में खुले शौच की व्यवस्था शहरों में सड़कों के किनारे आ गयी. अब उसे निर्मल भारत और स्वच्छ भारत से दूर किया जा रहा है.

खेती वास्तव में जुए जैसा धंधा बन गयी. अच्छी-खासी आयी फसल को कभी भी एकाएक कोई प्राकृतिक आपदा चौपट करती रही. किसान लाचार देखता रह जाता था.

ऐसे में राष्टï्र व राज्य स्तरों पर कृषि को सम्हालने के लिये सरकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य की नीति से बड़ा सहारा मिला और यह नीति सफल रही. इससे पहले प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने गेहूं के व्यापार का राष्टï्रीयकरण किया था. लेकिन वह पूरी तरह और बुरी तरह असफल रही और सरकार को वापस लेनी पड़ी थी. लेकिन समर्थन मूल्य नीति बहुत ही सफल रही और अब तक की सभी नीतियों में से इसी नीति ने खेती का लाभकारी धंधा भी दिया और यह बीमा पालिसी न होते हुए भी बीमा पालिसी की तरह लाभकारी रही. राज्यों ने फसल बीमा की तरफ कदम बढ़ाये उनमें मध्यप्रदेश भी एक है.

लेकिन प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने उसे राष्ट्रीय फसल बीमा पालिसी बना दिया. इसका श्रेय भी मध्यप्रदेश और उसके शेरपुर गांव को गया. गांवों की ओर खेती की इतनी बड़ी राष्ट्रीय योजना को भी गांव में ही उद्घाटित किया. मध्यप्रदेश ने देश में सबसे अधिक कृषि विकास दर 20.11 प्रतिशत हासिल की है. कृषि उत्पादन में उसे चौथी बार कृषि कर्मण पुरस्कार मिला है. प्रधानमंत्री श्री मोदी ने उसे कृषि में सिरमौर राज्य कहा. कृषक मुख्यमंत्री श्री चौहान ने खेती के विकास में अपनी हैसियत और हस्ती दिखा दी. प्रधानमंत्री श्री मोदी ने संकल्प लिया है कि वे अगले 7 सालों में 2022 तक किसानों की आमदनी को दुगना कर देंगे.

कृषि की उन्नति के लिये यह भी जरूरी है कि गांवों में टुकड़ों में बट चुके खेतों को भी सीलिंग की जगह एकत्रीकरण (कन्सालीडेशन) से इतनी बड़ी जोत बनाये कि उस पर लाभदायक खेती और मशीनों का उपयोग हो सके. अब शहरी पलायन के कारण खेत कटाई के ‘चैतुओंÓ मजदूर नहीं मिलते हैं और हारवेस्टर को बड़ा खेत चाहिए. अब न्यूनतम समर्थन मूल्य की तरह खेतों का न्यूनतम आकार भी तय होना चाहिए.

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