ऐसी व्यवस्था बनाये कि लोगों को जल्दी न्याय मिले, न्याय सबकी पहुंच में हो और जल्दी मिले, तभी आमजन का भरोसा बढ़ेगा, देरी हुई तो लगता है कि नहीं मिला न्याय, न्यायिक सक्रियता के खतरों से सावधान, न्यायिक सक्रिया के जोखिम से बचे, लोकतंत्र के तीनों अंग दायरे में रहकर काम करें आदि आदि. इन शीर्षकों से राजधानी भोपाल के अखबारों ने राष्टï्रपति श्री प्रणव मुखर्जी के भाषण को प्रकाशित किया जो उन्होंने भोपाल स्थित नेशनल जुडीशियल एकेडमी में आयोजित सुप्रीम कोर्ट जजों के रिट्रीट कार्यक्रम में व्यक्त किये.

ये सब बातें कब नहीं कहीं गयी और हमेशा कही जाती रहेंगी. राष्टï्रपति, प्रधानमंत्री भारत के मुख्य न्यायधीश, मुख्यमंत्री व राजनैतिक दलों के नेता, मंत्रीगण सभी ऐसे ही अवसरों पर यही बोलते आ रहे है और यही बोलते जायेंगे. यह एक सिलसिला है जो रिवाज बन गया है. जो यह कहते हैं यह करना भी उन्हीं को है लेकिन कहा खूब जा रहा है और हो कुछ नहीं रहा है.

यह कहा भी जा रहा है और माना भी जा भी जाता है कि न्याय में देरी का अर्थ है न्याय नहीं मिला. तो हमें इस यथार्थ को अब खुले तौर पर मान लेने में भी कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि हिन्दुस्तान में किसी को न्याय मिल ही नहीं रहा है और किसी को आगे भी इसकी उम्मीद नहीं करनी चाहिए. क्योंकि करने वाले बोल रहे है, कर नहीं रहे हैं. कथनी और करनी का फर्क इसी क्षेत्र में सबसे ज्यादा प्रमाण के रूप में लोगों के सामने है.

यह भी कहा जाता है कि अदालतों व जजों की बहुत कमी है और कमी भी इस हद तक पहुंच गयी है कि सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्टों में भी जजों के अनेक पद खाली पड़े रहते हैं. नियुक्ति के दिन से पता चल जाता है कि वह रिटायर किस दिन होंगे. फिर क्या वजह है कि उसी दिन से दूसरा जज वहां आ जाए. आई.ए.एस. व आई.पी.एस. और केन्द्रीय व राज्यों को सेवाओं के लोकसेवा आयोग चयन परीक्षा लेते हैं. ग्रेजुएट क्वालीफिकेशन के लोग उसमें बैठ जाते हैं. कुछ चुन लिये जाते हैं. लेकिन अदालतों में खासकर सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट के जज वे ही बनते हैं जो लम्बी और उच्च स्तर की वकालत कर चुके हैं या वह जिला जज जो वरिष्ठता में आये हैं, उन्हें ही जज बनाया जाता है. इसके लिए लॉ कालेज से निकल कर सीधे आई.ए.एस. व अन्य सेवाएं … की सीधी भर्ती नहीं होती है. फिर ये स्थान क्यों खाली पड़े हैं. जिला-तहसील स्तर पर अदालतों की कमी है- जो बनायी क्यों नहीं जा रहीं. जजों की भर्ती क्यों नहीं हो रही. लगातार बोलते रहने से क्या होने वाला है.

देश में न्याय व कानून व्यवस्था का यह हाल है कि दीवानी मुकदमा कई पीढिय़ों तक ‘चलताÓ है- इसेे को ‘चलताÓ कहना ही नहीं चाहिए. फौजदारी मामलों का यह हाल है कि अपराधी जमानत पर या जेल से सजा काटकर छूटते ही उसी दिन दूसरा अपराध कर देता है. उस पर न तो सजा का कोई असर है और न ही जेल में रहने का. लेकिन व्यवस्था यह मानकर संतुष्ट हो जाती है कि उसने सजा भुगत ली. अब वह पाक-साफ होकर सुधर गया है. ऊंची अदालतों से ऐसे फैसले आ जाते हैं- जो फैसले सरकार को करने चाहिए. मंत्री, अफसर समय पर आदेश या निर्णय लेते नहीं हैं. लोग अदालतों में कोई रिट या जनहित याचिका लेकर चले जाते हैं और उन्हें तो कहना-करना ही पड़ेगा.

हर साल हजारों टन खाद्यान्न व्यवस्था की कमी से बरबाद होता ही है. एक बार सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इससे अच्छा तो यह होगा कि गरीबों को बांट दिया जाए. खाद्य मंत्री श्री शरद पवार ने कहा कि यह नीतिगत सरकार का मामला है.
अदालत को ऐसे आदेश से बचना चाहिए, लेकिन देखने में यह भी आता है कि कई पेचीदा या मुश्किल मामले में सरकार के मंत्री व अफसर खुद फैसला लेने से बचते हैं और चाहते हैं कि अदालत कोई फैसला दे दे तो उनकी गर्दन नहीं फंसेगी. जिन्हें ये काम करना है वे अब बोले नहीं जो कह चुके हैं- वह उस पर अमल-कार्यवाही करें.

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