बचत जरूरत और संकट के समय ऐसी काम आती है कि जरूरत आसानी से पूरी हो जाती है और संकट महसूस नहीं होता. यह सब व्यक्ति अपनी कमाई से कर लेता है. तुलसीदास की चौपाई है ‘तुलसी पइसा पास का सबसे नीका होय’. समझदार लोग आमदनी के दिनों में बचत भी नियमित रूप करते जाते है.

उसके पारिवारिक जरूरतें बच्चों की पढ़ाई, शादी व अन्य अवसरों पर भार नहीं आता और बीमारी, नौकरी-धंधा छूटने या घाटा होने का दुष्प्रभाव भी वे आसानी से वहन कर लेते है. पारिवारिक व सामाजिक व्यवस्था में भी घर के समाज के लोग युवाओं को प्रारंभ से ही बचत करने का परामर्श देते है. बच्चों तक को ‘गुल्लकÓ देकर रेजगारी से बचत की आदत डाली जाती है.

शासन की प्रणाली में भी लोगों में बचत को प्रोत्साहित के कार्यक्रम शासकीय वित्तीय व्यवस्था का अनिवार्य कार्य माना जाता है. पोस्ट ऑफिस व बैंकों में लोगों के खातों में सबसे प्रमुख खाते को सेविंग्स एकाउंट कहा जाता है. नौकरियों में प्रारंभ से प्रोविडेंट फंड के कर्मचारी और नियोक्ता से बराबर का अंश पूरी नौकरी के काल में जमा कराया जाता है और उसे ‘भविष्य निधि’ माना जाता है.

बचत को भविष्य की आमदनी माना जाता है. बचत को जवानी में बुढ़ापे की अवस्था की व्यवस्था भी कहा गया है. समझदार लोग अपनी बड़ी-बड़ी जरूरतों मकान, कार, सुख-सुविधा को बढ़ाने के लिए पहले उसके लिये बचत करते हैं. बैंक भी कर्ज देने में मार्जिन मनी की मांग से यह तय करते हैं कि उनकी खुद की आर्थिक स्थिति क्या है. जो लोग खुशहाली में बचत नहीं करते वे बदहाली और कंगाली में भी चले जाते हैं. जिन्होंने जवानी में बचत नहीं की वे बुढ़ापे में घरों से भी तिरस्कृत होते हैं और वृद्धाश्रम में मोहताजी में देखे जाते हैं.

अभी तक सरकार अल्प बचत का विभाग संचालनालय होता है जो लोगों को बचत की कई स्कीमों से उन्हें बचत में प्रोत्साहित करता है. बचत व्यक्तिगत, सामाजिक व राष्ट्रीय जीवन की बहुत बड़ी आर्थिक गारन्टी है.

समाज में हर व्यक्ति व्यापार व निवेशक नहीं होता. स्थाई आमदनी वाला समाज का बहुत बड़ा वर्ग व्यक्तिगत बचत करता है. रिटायर होने पर उसे मिलने वाले फंड को फिक्स डिपाजिट से रखता है. जिस पर बैंकों से उसे ब्याज के रूप में स्थाई रूप से नियमित आमदनी होती है. कुछ वर्षों पूर्व कांग्रेस शासनकाल में बैंकों में बचत पर ब्याज की दरें कम की गयीं तो संसद में बड़ा आक्रोश प्रगट किया गया कि इसमें बचत करने की प्रवृत्ति खत्म होगी और लोगों को आर्थिक कष्टï होगा.

अब फिर से मोदी सरकार और उसके केंद्रीय वित्त मंत्री श्री अरुण जेटली ने तमाम बचत स्कीमों प्रोवीडेंट फंड, फिक्स डिपाजिट, किसान विकास पत्र, पोस्टल सेविंग, राष्टï्रीय बचत पत्र, वरिष्ठï नागरिक ब्याज दरें घटा दीं. अब यह और कह रहे हैं कि देश में बचत की दर काफी अधिक है और बैंकों को इन पर ब्याज में काफी रुपया देना पड़ता है. इसलिये सभी बचत योजनाओं पर ब्याज दर और कम की जानी चाहिये.

मोदी सरकार व्यक्ति, समाज व राष्टï्र की बचत की सुदृढ़ व्यवस्था को खत्म करके राष्टï्र में बदहाली और दुर्दशा ला रही है. जैसे बचत न करना- मूर्खता होती है उसी तरह मोदी सरकार का बचत की परम्परा को तोडऩा उसकी राजनैतिक मूर्खता है. यह राष्टï्र का जनजीवन की अर्थव्यवस्था को बरबाद करके रख देगी और दीर्घकाल तक इसके दुष्परिणाम लोगों और पूरे राष्टï्र को भुगतना होंगे. मोदी सरकार इसे बदहालों-कंगालों का मुल्क बनाने जा रही है.

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